राष्ट्रवाद व सदाचार के ‘प्रवचन’ केवल गरीबों के लिए?

इस बात से आिखर कौन इंकार कर सकता है कि देश के प्रत्येक नागरिक में राष्ट्रवाद तथा सदाचार की भावना का संचार होना चाहिए। देश का प्रत्येक नागरिक राष्ट्रवादी हो,स्वावलंबी बने,आर्थिक रूप से देश आत्मनिर्भर रहे तथा प्रत्येक भारतवासी विश्व के समक्ष एक आत्मनिर्भर सदाचारी व राष्ट्रवादी भावना रखने वाले देश के नागरिक के रूप में जाना व पहचाना जा सके,यह मनोकामना आिखर देश के किस नागरिक की नहीं होगी? हमारे देश के लोग कितने बलिदानी व राष्ट्रभक्त हैं तथा कैसी राष्ट्रवादी भावना रखते आ रहे हैं इस विषय पर हमें किसी प्रमाण अथवा साक्ष्य या किसी की गवाही की आवश्यकता नहीं है। पूरा विश्व जानता है कि 1857 से लेकर 1947 के मध्य की लगभग एक शताब्दी में भारतवर्ष के लोगों ने किस प्रकार बिना किसी संसाधन के एकजुट होकर संपन्न विदेशी ताकतों से जमकर मुकाबला किया तथा अपनी कुर्बानियां देकर देश को स्वाधीन कराया। आज़ादी के पहले का देशवासियों में स्वाभिमान जगाने का यही दौर था जिसमें भारतीय नागरिकों नेेें विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया,विदेशी सामानों की जगह-जगह होलियां जलाई गईं,स्वदेशी वस्त्र के रूप में महात्मा गांधी ने खादी के वस्त्र को प्रचलित किया जो आज भी देश के नेताओं के तन की शोभा बढ़ा रहा है। गांधी जी ने तो अपना वैभवपूर्ण रहन-सहन त्याग कर स्वयं को आजीवन एक धोती में लपेट लिया और देश के गरीबों की पंक्ति में खड़े होने की कोशिश की।

निर्मल रानी

आज एक बार फिर देश के लोगों की राष्ट्रवाद तथा सदाचार को लेकर परीक्षा ली जा रही है। आज पूरे देश में लगभग सभी छोटी से छोटी व बड़ी से बड़ी वस्तुएं यहां तक कि रोज़मर्रा के इस्तेमाल की चीज़ें,सजावट के सामान,बिजली,मशीनरी,कंप्यूटर संबंधी सामग्रियां, मोबाईलआदि तमाम प्रकार की चीज़ें पड़ोसी देश चीन से आयात की जा रही हैं। ज़ाहिर है भारत में इन चीनी सामग्रियों की लोकप्रियता का कारण यही है कि वे सस्ती व कारगर हैं। देखने में आकर्षक व सुंदर हैं। और सबसे बड़ी बात तो यह कि उन चीनी सामग्रियों जैसी सामग्री अब तक भारतीय बाज़ार में निर्मित ही नहीं की गई है। यही वजह है कि सस्ती व आकर्षक सामग्री होने के कारण चीन ने भारतीय बाज़ार में अपनी गहरी पैठ बना ली है। परंतु चीन अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को लेकर भारत के साथ हमेशा से ही संदेह व अविश्वासपूर्ण रिश्ते रखता आ रहा है। कभी वह पाकिस्तान को परमाणु हथियार बनाने में सहायता देकर भारत की सुरक्षा के प्रति चिंता को बढ़ाता है तो कभी पाक स्थित मोस्ट वांटेड आतंकियों को समर्थन देकर या उनके प्रति नरम रवैया अपना कर भारत को नीचा दिखाने की कोशिश करता है। समय-समय पर चीन भारतीय सीमा से लगे अपने विभिन्न सीमावर्ती क्षेत्रों में घुसपैठ करने की कोशिश करता है। अभी पिछले दिनों डोकलाम में चीनी सैन्य घुसपैठ के कारण दोनों देशों के मध्य इतना तनाव बढ़ गया था कि युृद्ध के बादल तक मंडराने लगे थे।

ज़ाहिर है ऐसे में यह प्रत्येक देशभक्त व राष्ट्रवादी भारतीय नागरिक का दायित्व है कि वे ऐसा कोई भी कदम न उठाएं जिससे अपना देश कमज़ोर हो और चीन ताकतवर बने। ऐसे में नि:संदेह प्रत्येक भारतीय नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह चीनी वस्तुओं की खरीददारी पर अंकुश लगाए। और स्वदेशी वस्तुओं की खरीददारी कर भारतीय मुद्रा को अपने ही देश में रखने का प्रयास करे। परंतु क्या राष्ट्रवाद व राष्ट्रभक्ति की भावना को परवान चढ़ाने का जि़म्मा केवल देश के गरीब लोगों का ही है? क्या देश की सरकारें,देश के राजनैतिक दल अथवा राजनेता या देश के साधन संपन्न धनाढ्य लोग राष्ट्रवाद की भावनाओं से अलग हैं? सवाल यह है कि यदि चीनी सामग्री खरीदने से रोकने के लिए देश के नागरिकों को प्रोत्साहित किया जाता है और इसके लिए उन्हें देशप्रेम व राष्ट्रवाद का वास्ता दिया जाता है तो आिखर केंद्र सरकार ही इन चीनी सामग्रियों के भारत में आने पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगा देती? दूसरी बात यह कि जिस समय भारत में नोटबंदी की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई उसी के साथ-साथ पूरे देश में पेटीएम नामक कंपनी ने कैशलेस लेन-देन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से देश में अपने पांव पसारे। निश्चित रूप से सरकार का भी इस कंपनी को पूरा समर्थन रहा। यहां के टीवी से लेकर अन्य तमाम माध्यमों में पेटीएम का प्रचार दिन-रात जमकर किया गया। सवाल यह है कि चीन आधारित इस कंपनी को भारत में पांव पसारने हेतु किसने आमंत्रित किया? देश की सरकार व नीति निर्माताओं ने या देश की गरीब जनता ने?

ऐसा ही एक और सवाल खासतौर पर भारतीय जनता पार्टी के कर्णधारों से है। भाजपा से यह सवाल खासतौर पर इसलिए क्योंकि देश के लोगों में कथित राष्ट्रवाद व सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भावना जागृत करने का तथा चीनी सामग्रियों के बहिष्कार करने का सबसे बड़ा ‘ठेका’ इसी दल के लोगों ने स्वयंभू रूप से ले रखा है। इसके संरक्षक हिंदूवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व स्वदेशी जागरण मंच पूरे ज़ोर-शोर से चीनी सामग्री के बहिष्कार के अभियान में लगे हुए हैं। क्या इन सत्ताधारी लोगों के पास इस बात का जवाब है कि इन्होंने नागपुर में मैट्रो रेल बनाने व इसे संचालित करने का ठेका चीन को ही क्यों दिया? वर्तमान सरकार के दौर में ओपो तथा वीवो नामक चीनी मोबाईल फोन कंपनियों ने पूरे देश में अपना व्यवसाय इतनी तेज़ी से कैसे फैला लिया? यहां तक कि प्राप्त समाचारों के अनुसार भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात चुनाव में इस्तेमाल की जाने वाली प्रचार सामग्री चीन से आयात की है। क्या चीनी सामग्री के बहिष्कार का देशवासियों को प्रवचन पिलाने वाले इन स्वयंभू राष्ट्रवादियों को यह शोभा देता है कि एक ओर तो वे स्वदेशी अपनाओ का नारा दे रहे हैं,मेक इन इंडिया की बात कर रहे हैं तो दूसरी ओर खुद करोड़ों की चुनाव सामग्री चीन से मंगवा रहे हैं? राष्ट्रवाद का प्रवचन बघारने में आिखर इस दोहरेपन का औचित्य क्या है?

इसी प्रकार देश के लोगों को प्रधानमंत्री ने यह ‘सद्वचन’ सुना रखा है कि न खाऊंगा न खाने दूंगा। ज़ाहिर है अपनी इस बात के द्वारा उनका सीधा सा मकसद यह संदेश देना है कि वे भ्रष्टाचार बिल्कुल सहन नहीं करेंगे। परंतु पिछले दिनों जिस प्रकार भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के पुत्र जय अमित शाह की अचानक एक ही वर्ष में 16 हज़ार गुणा बढ़ी कमाई का पर्दा फाश हुआ उस समय भाजपा के नेता बगलें झांकते दिखाई दिए और खिसियाहट में इस रिपोर्ट को उजागर करने वाली महिला पत्रकार तथा इस रिपोर्ट को प्रकाशित करने वाली वेबसाईट पर सौ करोड़ की मानहानि का दावा कर दिया। हिमाचल प्रदेश में जिस सुखराम को कांग्रेस पार्टी ने भ्रष्टाचार के संगीन इल्ज़ाम में पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था और वे अपनी पार्टी बनाकर हिमाचल प्रदेश की राजनीति में सक्रिय थे उनके पुत्र अनिल शर्मा को पिछले दिनों भाजपा ने अपने साथ शामिल कर लिया। जब इस विषय पर भाजपा नेताओं का ध्यान दिलाया गया कि यह उन्हीें सुखराम के पुत्र हैं जो भ्रष्टाचार के सिरमौर रह चुके हैं और कांग्रेस पार्टी से इसी विषय पर निष्कासित किए गए थे तो इस पर भाजपा प्रवक्ता फरमाते हैं कि-‘जो बीत गई वो बात गई’। गोया भ्रष्टाचार व सदाचार तथा राष्ट्रभक्ति व राष्ट्रवाद जैसे विषयों पर भाजपाईयों का काम केवल जनता को प्रवचन देना मात्र है उस पर स्वयं अमल करना नहीं। कम से कम वर्तमान दौर में उपरोक्त परिस्थितियां तो यही साबित कर रही हैं।