ऐसे बयानों से बचें नेता

ताजमहल और मुगलकाल इस समय भारी हंगामे एवं विवाद का विषय बना हुआ है। वास्तव में उत्तर प्रदेश के सरधाना से भाजपा विधायक संगीत सोम ने ताजमहल और मुगलों के बारे में जो बयान दिया उस पर विवाद और हंगामा स्वाभाविक था। उनके बयान से ध्वनि यह निकल रही थी कि मुगल काल को न सिर्फ इतिहास से बाहर किया जाएगा बल्कि उस काल में निर्मित होने की मान्यता वाले स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने ताजमहल जैसे स्थलों के साथ भी दुर्व्यवहार किया जाएगा। बयान देते समय भी उन्हें इस बात का आभास रहा होगा कि इससे विवाद पैदा होगा। इसका अर्थ यह हुआ कि उन्होंने जानबूझकर यह बयान दिया। इसका एक कारण तो यह हो सकता है कि संगीत सोम लंबे समय से सुर्खियों से गायब थे। उत्तर प्रदेश सरकार में उन्हें मंत्री भी नहीं बनाया गया। ऐसे में यदि खबरों में बने रहना है तो फिर ऐसे लोगों के पास रास्ता एक ही बचता है, किसी तरह विवादित बयान दो। उन्होंने यही किया है। इसे आप उनकी सोच का प्रकटीकरण भी कह सकते हैं। वैसे इस तरह की सोच रखने वाले संगीत सोम अकेले व्यक्ति नहीं हो सकते। आखिर जब वे भाषण दे रहे थे जो लोग तालियां बजा रहे थे। जाहिर है, इस तरह का विचार रखने वालों की संख्या है।

किंतु किसी विचार को संख्याबल के आधार पर उचित और अनुचित करार नहीं दिया जा सकता है। मूल बात है कि ऐसे बयानों का असर क्या होता है। हम भी मानते हैं कि मंुुगल बाहर से आए थे, लेकिन शासन करते हुए वे यहीं बस गए। अब यह कहना कि पूरे मुगल काल को हम इतिहास से निकाल देंगे नासमझी के सिवा कुछ नहीं है। ऐसा संभव ही नहीं है। जब हम ब्रिटिश काल को इतिहास के पन्नों से नहीं हटा सकते तो फिर मुगल काल को कैसे हटा सकते हैं। मुगल काल में अलग-अलग बादशाहों के कार्यकाल को लेकर दो मत तो रहेंगे और हैं भी। इतिहास की किताबों में ही आपको हर बादशाह को लेकर कई मत मिलते हैं और उनके आधार पर हम अपना निष्कर्ष निकालते हैं। यही इतिहास पढ़ने और समझने का तरीका है। लेकिन 1526 से 1857 तक के कालखंड तक मुगल किसी न किसी तरह बने रहे। इतने लंबे कालखंड को आप इतिहास से कैसे बाहर कर सकते हैं? तो मुगल काल हो या उसके पहले का सल्तनत काल कोई इतिहास के पन्नों से उसे बाहर नहीं निकाल सकता और निकाला जाना भी नहीं चाहिए। उस कार्यकाल को लेकर मतांतर होंगे और होना भी चाहिए। इसमें किसी प्रकार का संदेह करने की आवश्यकता नहीं है।

हम मानते हैं कि इतिहास लेखन ही हमारे देश में विवाद और बहस का विषय रहा है। आधुनिक इतिहास की एक धारा अंग्रेजों के समय थी जिनने अपने तरीके से इतिहास लिखे। उसका आजादी के संघर्ष के दौरान भी विरोध होता था और आज भी होता है। किंतु उन्होंने अपनी दृष्टि और तरीके से हमारे देश के इतिहास पर काफी काम किया इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। यह बात अलग है कि उनमें से ज्यादातर के पीछे औपनिवेशिक नजरिया था।  उसे हम हूबहू स्वीकार नहीं कर सकते। उसकी प्रतिक्रिया में भारतीयों की दो धाराओं ने इतिहास रचना की। एक धारा वामपंथियों की थीं। इनने भी इतिहास को निष्पक्ष नजरिए से देखने की जगह मार्क्सवादी नजरिया अपनाया। इनने शोध भी खूब किए, मेहनत भी किए, ऐसे अनेक तथ्य हमारे सामने लाए जो कि उनके बगैर शायद सामने नहीं आता। इस तरह उनका इतिहास लेखन में योगदान तो है लेकिन वह भी पूरी तरह से सच्चाई के निकट न होकर विचारधारा के निकट है। एक धारा राष्ट्रवादियों की रही है जिन्होंने इन दोनों से परे भारतीय राष्ट्रवाद को ध्यान में रखकर इतिहास लिखे। कुछ लोग इन्हें स्वीकार करते हैं, लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि इसमेे राष्ट्रवाद की छौंक कुछ ज्यादा है इसलिए यह एकदम शुद्ध इतिहास नहीं हो सकता। इन दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इतिहास पुनर्लेखन समिति जैसे संगठन की रचना कर इतिहास को नए सिरे से लिखवाने का काम कर रहा है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस पर भी विवाद है और रहेगा।

किसी भी पढ़े-लिखे समाज में विवाद और बहस स्वाभाविक है। विषयों पर मतभेद भी स्वाभाविक है। यह होना ही चाहिए। हम यह भी मानते हैं कि जिस तरह से दूसरों को अपना विचार रखने का अधिकार है उसी तरह संगीत सोम को भी है। किंतु किसी स्थिति में ऐसा बयान नहीं दिया जाना चाहिए जिससे सांप्रदायिक विद्वेष की भावना पैदा हो। संगीत सोम ने जिस तरह से कहा उससे ऐसा ही होता है। इसीलिए ऐसे बयान अस्वीकार्य है। खासकर ऐसे नेता को तो एक-एक शब्द सोच-समझकर इस्तेमाल करना चाहिए जिसकी केन्द्र और प्रदेश दोनों जगह सरकारें हों। सरकारी पार्टी की ओर से संयमित बयान की ही अपेक्ष की जाती है। आपको देश और प्रदेश चलाना है तो फिर संतुलन आपको बनाना ही पड़ेगा। बेशक, ताजमहल को लेकर अनेक इतिहासकारों ने अलग-अलग मत प्रकट किया है। यह भी रहेगा। लेकिन वह स्थापत्य का ऐसा नमूना है जिसे दुनिया के आश्चर्यों में शामिल किया गया है। कोई उसे ध्वस्त करने का विचार करे तो उसे मानसिक रुप से असंतुलित ही कहना होगा। वैसे ऐसा शायद ही किसी देश में हुआ हो जहां आजादी के साथ गुलामी काल में बनाए गए सारे इमारतों को ध्वस्त कर दिया जाए। यह न उचित है न व्यावहारिक ही। दुनिया में ऐसे बहुत कम देश हैं जिनको किसी न किसी समय गुलामी न झेलनी पड़ी हो। विश्व के इतिहास का एक पूरा कालखंड ही औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी काल के नाम से जाना जाता है। अगर ऐसे सारे देश अपनी गुलामी के समय के अवशेषों को खत्म करने लगें तो फिर दुनिया का चरित्र बदल जाएगा। हमारे देश की जो संसद है वही ब्रिटिशों द्वारा निर्मित है। तो क्या उसे कलंक मानकर नष्ट कर दें? हम तो उसी में आजादी के बाद से अपने देश का की नियति संवार रहे हैं।

वैसे संगीत सोम भाजपा में ऐसे स्तर के नेता नहीं हैं जो निर्णय कर सकें। यह अच्छा हुआ कि पहले प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तथा उसके बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस बयान को नकार दिया। इस बयान से कायम संदेहों को दूर करने के लिए आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार 26 अक्टूबर को आगरा जा रहे हैं जहां वे ताजमहल सहित कई पर्यटक स्थलों का दौरा करेंगे तथा कुछ घोषणाएं भी करेंगे। यह अच्छा कदम है। इससे ताजमहल को लेकर पहले से भी जो संशय कायम है वह दूर हो जाना चाहिए। उन्होेंने यह साफ किया है कि कौन क्या कहता है यह मायने नहीं रखता, जरुरी यह है कि भारतीयों के खून पसीने से बने हर स्मारक का संरक्षण किया जाए और पर्यटन की दृष्टि से भी इनका संरक्षण किया जाना जरुरी है। यह देश को दिया हुआ बचन है। इसी तरह प्रधानमंत्री मोदी द्वारा यह साफ कर दिया गया है कि हमें ऐतिहासिक विरासत पर गर्व करने की आवश्यकता है। हमारा मानना है कि योगी एवं मोदी के स्पष्टीकरण के बाद ताजमहल या मुस्लिम शासनकाल में बने अन्य इमारतों के भविष्य को लेकर कायम आशंकाएं समाप्त हो जानी चाहिए। इस पर विवाद का भी अंत हो जाए तो देश के लिए अच्छा हो। आखिर प्रधानमंत्री के बाद किसको इस बारे में स्पष्टीकरण देने या कुछ बोलने की आवश्यकता रह जाती है? किंतु हमारे देश की राजनीति है कि भले संगीत सोम के बयानों से भाजपा एवं सरकार ने अपने को अलग कर लिया, उनके संरक्षण का वायदा भी किया गया, लेकिन विवाद आसानी से नहीं थमता। इसीलिए आजम खान और असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं का मुंह बंद हो जाएगा ऐसा नहीं मानना चाहिए। किंतु हमें आपको ऐसे बयानों को महत्व देने की आवश्यकता नहीं है जिससे अनावश्यक सांप्रदायिक विद्वेष की भावना पैदा होती हो।

-अवधेश कुमार