दीपावली है लौकिकता और आध्यात्मिकता का अनूठा पर्व

दीपावली का पर्व ज्योति का पर्व है। दीपावली का पर्व पुरुषार्थ का पर्व है। यह आत्म साक्षात्कार का पर्व है। यह हमारे आभामंडल को विशुद्ध और पर्यावरण की स्वच्छता के प्रति जागरूकता का संदेश देने का पर्व है। यह अपने भीतर सुषुप्त चेतना को जगाने का अनुपम पर्व है। जिंदगी भी हमसे यही चाहती है कि हम अपने उजाले खुद तय करें और उन पर यकीन रखें। नकारात्मकता, अवसाद और तनाव के अंधेरों को हटाकर जीवन को खुशियों के उजास से भरना कोई बहुत कठिन काम नहीं, बशर्ते कि हम जिंदगी की ओर एक विश्वास भरा कदम उठाने के लिए तैयार हों।

ललित गर्ग

इसी विश्वास का जागृत करने का भगवान महावीर ने दीपावली की रात सन्देश दिया कि जागो, प्रमाद मत करो, क्योंकि प्रमाद में कृत-अकृत का विवेक ही खो जाता है। उन्होंने कहा- सोए मन की ऊर्जा का अपव्यय होता है, उपयोग नहीं। इसलिये सोए से जागना जरूरी है। महावीर की यह शिक्षा मानव मात्र के आंतरिक जगत को आलोकित करने वाली है। तथागत बुद्ध की अमृत वाणी ‘अप्पदीवो भव’ अर्थात ‘आत्मा के लिए स्वयं दीपक बन’ वह भी इसी भावना को पुष्ट कर रही है।

हर रात घर की देहलीज पर दीए की जगमगाहट होती है। हर सुबह सूरज रोशनी लिये धरती पर उतरता है। फिर भी आश्चर्य होता है कि प्रकाश के बीच खड़ा आदमी स्वयं को अंधेरों से घिरा होने का भ्रम क्यों पालता है? आखिर यह अंधेरा है कैसा? खुली आंखों से सही-सही देख न पाएं तो समझना चाहिए कि यह अंधेरा बाहर नहीं, हमारे भीतर ही कहीं घुसपैठ किये बैठा है और इसलिये भारतीय संस्कृति के संवाहक दीपावली जैसे त्यौहार दीये से दीया जलाने की, परम्परा को समृद्ध कर आदमी को अपने भीतर प्रकाश देखने का, प्रकाश में होने का विश्वास देते हैं, अंधेरों की उम्र कम करते हैं।

यह बात सच है कि मनुष्य का रूझान हमेशा प्रकाश की ओर रहा है। अंधकार को उसने कभी न चाहा न कभी माँगा। ‘तमसो मा ज्योतिगर्मय’ भक्त की अंतर भावना अथवा प्रार्थना का यह स्वर भी इसका पुष्ट प्रमाण है। अंधकार से प्रकाश की ओर ले चल इस प्रशस्त कामना की पूर्णता हेतु मनुष्य ने खोज शुरू की। उसने सोचा कि वह कौन-सा दीप है जो मंजिल तक जाने वाले पथ को आलोकित कर सकता है। अंधकार से घिरा हुआ आदमी दिशाहीन होकर चाहे जितनी गति करें, सार्थक नहीं हुआ करती। आचरण से पहले ज्ञान को, चारित्र पालन से पूर्व सम्यक्त्व को आवश्यक माना है। ज्ञान जीवन में प्रकाश करने वाला होता है। शास्त्र में भी कहा गया-‘नाणं पयासयरं’ अर्थात ज्ञान प्रकाशकर है। चाक पर मिट्टी को आकार देते हुए, नदी में जाल डालते हुए, जंग के मैदान में तलवार चलाते हुए या गुरु के सम्मुख बैठ किताबों की गंध महसूस करते हुए सुख, संतुष्टि और सत्य को किसी भी क्षण, किसी भी रास्ते पाया जा सकता है। लेकिन इसके लिये प्रयास तो स्वयं को ही करना होगा। जिस जीवन की जांच-परख न की गई हो, वह जीने योग्य नहीं। जिस जीवन में नींद और जागृति केवल एक परम्परा हो, वो जीवन जीने योग्य नहीं, जीने योग्य जीवन वह है, जहां हर एक व्यक्ति अपने जीवन की कहानी का नायक हो। माना ये ठीक वैसा ही है, जैसा दो अलग-अलग दिशाओं में भागते घोड़ों की बग्घी को संभालना, लेकिन अगर रास थामनी आ जाए तो असंभव कुछ भी नहीं।

हमारे भीतर अज्ञान का तमस छाया हुआ है। वह ज्ञान के प्रकाश से ही मिट सकता है। ज्ञान दुनिया का सबसे बड़ा प्रकाश दीप है। जब ज्ञान का दीप जलता है तब भीतर और बाहर दोनों आलोकित हो जाते हैं। अंधकार का साम्राज्य स्वतः समाप्त हो जाता है। ज्ञान के प्रकाश की आवश्यकता केवल भीतर के अंधकार मोह-मूच्र्छा को मिटाने के लिए ही नहीं, अपितु लोभ और आसक्ति के परिणामस्वरूप खड़ी हुई पर्यावरण प्रदूषण और अनैतिकता जैसी बाहरी समस्याओं को सुलझाने के लिए भी जरूरी है।

आतंकवाद, भय, हिंसा, प्रदूषण, अनैतिकता, ओजोन का नष्ट होना आदि समस्याएँ इक्कीसवीं सदी के मनुष्य के सामने चुनौती बनकर खड़ी है। आखिर इन समस्याओं का जनक भी मनुष्य ही तो है। क्योंकि किसी पशु अथवा जानवर के लिए ऐसा करना संभव नहीं है। अनावश्यक हिंसा का जघन्य कृत्य भी मनुष्य के सिवाय दूसरा कौन कर सकता है? आतंकवाद की समस्या का हल तब तक नहीं हो सकता जब तक मनुष्य अनावश्यक हिंसा को छोड़ने का प्रण नहीं करता।

मोह का अंधकार भगाने के लिए धर्म का दीप जलाना होगा। जहाँ धर्म का सूर्य उदित हो गया, वहाँ का अंधकार टिक नहीं सकता। एक बार अंधकार ने ब्रह्माजी से शिकायत की कि सूरज मेरा पीछा करता है। वह मुझे मिटा देना चाहता है। ब्रह्माजी ने इस बारे में सूरज को बोला तो सूरज ने कहा-मैं अंधकार को जानता तक नहीं, मिटाने की बात तो दूर, आप पहले उसे मेरे सामने उपस्थित करें। मैं उसकी शक्ल-सूरत देखना चाहता हूँ। ब्रह्माजी ने उसे सूरज के सामने आने के लिए कहा तो अंधकार बोला-मैं उसके पास कैसे आ सकता हूँ? अगर आ गया तो मेरा अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।

हालाँकि दीपावली एक लौकिक पर्व है। फिर भी यह केवल बाहरी अंधकार को ही नहीं, बल्कि भीतरी अंधकार को मिटाने का पर्व भी बने। हम भीतर में धर्म का दीप जलाकर मोह और मूच्र्छा के अंधकार को दूर कर सकते हैं। दीपावली के मौके पर सभी आमतौर से अपने घरों की साफ-सफाई, साज-सज्जा और उसे संवारने-निखारने का प्रयास करते हैं। उसी प्रकार अगर भीतर चेतना के आँगन पर जमे कर्म के कचरे को बुहारकर साफ किया जाए, उसे संयम से सजाने-संवारने का प्रयास किया जाए और उसमें आत्मा रूपी दीपक की अखंड ज्योति को प्रज्वलित कर दिया जाए तो मनुष्य शाश्वत सुख, शांति एवं आनंद को प्राप्त हो सकता है। महान दार्शनिक संत आचार्य श्री महाप्रज्ञ लिखते हैं-हमें यदि धर्म को, भीतर को, प्रकाश को समझना है और वास्तव में धर्म करना है तो सबसे पहले इंद्रियों को बंद करना सीखना होगा। आँखें बंद, कान बंद और मुँह बंद-ये सब बंद हो जाएँगे तो फिर नाटक या टी0वी0 देखने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। नाटक देखने की जरूरत उन्हें पड़ती है, जो अंतर्दर्शन में नहीं जाते। यदि आप केवल आधा घंटा के लिए सारी इंद्रियों को विश्राम देकर बिलकुल स्थिर और एकाग्र होकर अपने भीतर झाँकना शुरू कर दें और इसका नियमित अभ्यास करें तो एक दिन आपको कोई ऐसी झलक मिल जाएगी कि आप रोमांचित हो जाएँगे। आप देखेंगे-भीतर का जगत कितना विशाल है, कितना आनंदमय और प्रकाशमय है। वहाँ कोई अंधकार नहीं है, कोई समस्या नहीं है। आपको एक दिव्य प्रकाश मिलेगा। एक बहुत पुराना सूत्र है- पूछो, एक जवाब जरूर मिलेगा। दस्तक दो, एक द्वार जरूर खुलेगा और आंखें खोलो, एक रोशन रास्ता जरूर सामने होगा।

प्लाटिनस ने भी तो यही समझाया था, ‘अंतर्मुखी होकर देखो, यदि तुम फिर भी खुद को सुंदर न पाओ तो वही करो, जो एक मूर्तिकार करता है। मानो अपनी मूर्ति को सुंदर बनाने के लिए वो यहां से कुछ काटता है। कुछ वहां चिकना करता है। किसी रेखा को हल्की बनाता है, तो दूसरी को ज्यादा निखार देता है और इस तरह वह तब तक जुटा रहता है, जब तक कि मूर्ति का चेहरा जीवन की आभा से जगमगा न उठे। इसीलिये मैक्स ने कहा, ‘संघर्ष चाहे खुद से हो या किसी और से जिंदगी मे ंएक योद्धा की तरह खड़े होने के लिए आत्म-छवि में सुधार सबसे ज्यादा अहम है।’ और केवल मैक्स नहीं, दुनिया के सभी मनोवैज्ञानिक इस बात से इत्तिफाक रखते हैं कि ‘संघर्ष के बिना जीवन नहीं, लेकिन इस जीवन संघर्ष में यदि व्यक्ति सकारात्मक सोच रखता है, तो परिणाम भी सकारात्मक हासिल करता है।’ सफलता, असफलता कुछ और नहीं हमारे विचारों का खेल भर है। यद्यपि लोक मानस में दीपावली एक सांस्कृतिक पर्व के रूप में अपनी व्यापकता सिद्ध कर चुका है। फिर भी यह तो मानना ही होगा कि जिन ऐतिहासिक महापुरुषों एवं ऐतिहासिक घटना प्रसंगों से इस पर्व की महत्ता जुड़ी है, वे अध्यात्म जगत के शिखर पुरुष थ और जीवन की अलौकिक घटनाएं थी। इस दृष्टि से दीपावली पर्व लौकिकता के साथ-साथ आध्यात्मिकता का अनूठा पर्व है।

Leave a Reply