क्रिकेट की चकाचौंध में गुमनाम हुआ हाकी का यह नायक……….

रांची,  क्रिकेट के कैप्टन कूल रहे महेंद्र सिंह धोनी के आलीशान बंगले के बगल से एक संकरी सी गली जाती है रांची की हरमू रोड आवासीय कालोनी के बी टाइप क्वार्टर की ओर जहां मास्को ओलंपिक की स्वर्ण पदक विजेता हाकी टीम के सदस्य रहे सिल्वेनस डुंगडुग रहते हैं और बडे दुख के साथ कहते हैं कि क्रिकेट की चकाचौंध में उनके ओलंपिक स्वर्ण की चमक लोग भूल गए हैं।

मास्को में 1980 में स्पेन के खिलाफ ओलंपिक हाकी फाइनल में गोल्डन गोल करने वाले डुंगडुंग पिछले 24 साल से यहां रह रहे हैं । उनके घर के बाहर लगी तख्ती पर उनके नाम के साथ लिखा है ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता सूबेदार मेजर मानद कैप्टन सिल्वेनस डुंगडुंग लेकिन इसके बावजूद खेलप्रेमियों से पूछो कि झारखंड किसके लिये मशहूर है तो जवाब एक ही होगा महेंद्र सिंह धोनी। डुंगडुंग और मनोहर टोप्नो समेत इस प्रदेश ने 10 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय पुरूष और महिला हाकी स्टार दिये हैं।

डुंगडुंग को हालांकि क्रिकेट से कोई गिला नहीं है । उन्होंने भाषा से कहा, ‘‘युवा पीढी को गौरवशाली इतिहास की कम ही जानकारी है और वे क्रिकेट के दीवाने है । यही वजह है कि धोनी को सब जानते हैं लेकिन मेरे बारे में बहुत कम को पता होगा । मुझे अब और दुख नहीं होता क्योकि मैं इस फख्र के साथ मर सकूंगा कि मैने ओलंपिक में गोल्ड जीता था।’’ मास्को ओलंपिक के बाद अंतरराष्ट्रीय हाकी को अलविदा कहने वाले डुंगडुंग 1988 में सेना की नौकरी से सेवानिवृत होने के बाद 1993 में यहां आ बसे। गुमनामी के अपने अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि कई बार उन्हें बताना पडता है कि उन्होंने देश के लिये ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता है। यही नहीं 70 पार की उम्र में 30000 रूपये महीने की नौकरी करते हुए अब उन्हें भविष्य की चिंता सताने लगी है।

उन्होंने कहा, ‘‘मैंने 2004 से 2013 तक झारखंड की लडकियों की टीम को कोचिंग दी । इसके बाद झारखंड राज्य खेल कोआर्डिनेटर का काम मिला हालांकि मन अब भी मैदान में ही रमता है । दफ्तर का काम रास नहीं आता लेकिन नौकरी है करनी तो पडे़गी वरना ये 30000 रूपये महीना तनख्वाह कहां से मिलेगी । यह नहीं मिलेगी तो काम कैसे चलेगा ।’’ इस वेतन के अलावा उन्हें केंद्रीय खेल मंत्रालय से ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता के तौर पर 10000 रूपये मासिक भत्ता मिलता है । क्रिकेट की तरह हाकी में अभी पूर्व खिलाडियों के लिये पेंशन की कोई योजना नहीं है ।

इतने साल बाद पिछले साल मेजर ध्यानचंद पुरस्कार पाने वाले डुंगडुंग ने कहा , ‘‘पूर्व खिलाडियों के लिये पेंशन का इंतजाम जरूर होना चाहिये । हमारी कोई जमा पूंजी तो है नहीं । जिंदगी खेल को देने के बाद बाकी समय मुफलिसी में ही कटता है । ’’