मांसाहार के लिये भगवान गणेश का उपयोग क्यों?

ऑस्ट्रेलिया में इन दिनों मांसाहार के प्रचार के लिये एवं उसकी बिक्री बढ़ाने के लिये जिस तरह से हिन्दू धर्म के आस्था के प्रमुख केन्द्र एवं प्रथम देव भगवान गणेश को विज्ञापनों में दिखाया जा रहा है, उससे वहां रह रहे हिन्दू धर्म के मानने वाले लोगों की भावना आहत हुई है और वे इस दुष्प्रचार को रोकने के लिये सड़कों पर उतर आये हैं। इस घोर आपत्तिजनक विज्ञापन के खिलाफ ऑस्ट्रेलिया के हिन्दू समूहों ने शिकायत दर्ज करवाई है, जिसे विज्ञापन निगरानी संस्था ने खारिज कर दिया। उसके बाद वहाँ के भारतीय समुदाय के सदस्यों ने सिडनी, मेलबर्न और ब्रिस्बेन समेत अनेक शहरों में इस विज्ञापन के खिलाफ रैलियाँ आयोजित की और शान्तिपूर्ण प्रदर्शन किये। ऑस्ट्रेलिया में भारत के उच्चायोग ने राजधानी कैनबरा से ८ सितम्बर २०१७ को प्रेस रिलीज जारी करके इस विज्ञापन को भारतीय समुदाय के लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला बताया। सिडनी में भारत के महावाणिज्यदूत ने इस विज्ञापन पर रोक की मांग की। क्यों एक धर्म-विशेष की भावनाओं को जानबूझकर आहत किया जा रहा है? क्यों मांसाहार जैसी हिन्दू धर्म में वर्जित चीज के लिये उन्हीं के देव को प्रचार-प्रसार का माध्यम बनाया गया? वस्तुतः ऐसे विज्ञापन न सिर्फ भारत के हिन्दू समुदाय, अपितु दुनियाभर के करोडों-करोडों शाकाहारी समुदाय के लोगों एवं मानव की आदर्श शाकाहारी जीवन-शैली पर सीधा हमला है। आज यदि सभी कथनी-करनी में समानता रखने वाले दुनिया के दृढ़ मनोबली एवं शाकाहार को बदल देने वाले इस मांसाहार प्रचार के विरोध में एक साथ खड़े हो तो मीट एंड लाइवस्टॉक आस्ट्रेलिया (एमएलए) को पुनः चिन्तन के लिए विवश होना पड़ेगा। क्योंकि उनकी उस एक पंक्ति में असंख्य निरीह पशुओं की आर्त पुकार भी सम्मिलित होगी।

ललित गर्ग

मांसाहार को प्रोत्साहित करने एवं उसके प्रचार करने के लिए मांस उद्योग तरह-तरह के हथकण्डे अपनाता रहा है। भारत में भी इस तरह की कुचेष्टाएं होती रही हैं। व्यावसायिक लोगों के द्वारा अपने लाभ के लिये एवं सरकारें भी मांसाहार एवं अण्डे के प्रचार एवं प्रयोग के लिये इस तरह के तथाकथित क्रूर एवं धार्मिक आस्थाओं को कुचलने वाले उपक्रम करती रही है। हमारे यहां अण्डे को ‘शाकाहार’’ और ‘निर्जीव’’ के रूप में प्रचारित करके पौल्ट्री उद्योग ने अपना व्यावसायिक जाल फैलाने की कुटिल कोशिश की। इसके अलावा, अपने क्रूर धंधे के विस्तार के लिए मांस-उद्योग पावन सांस्कृतिक एवं धार्मिक प्रतिमानों के साथ भी खिलवाड कर बैठता है। इसी तरह का एक उदाहरण ऑस्ट्रेलिया में देखने को मिला। वहाँ मेमने के गोश्त के प्रचार के लिए तैयार विज्ञापन में करोडों हिन्दुओं की आस्था के केन्द्र भगवान गणेश को दिखाया गया। मीट एंड लाइवस्टॉक आस्ट्रेलिया (एमएलए) ने यह विज्ञापन सितम्बर-२०१७ के शुरू में जारी किया। मांस के विज्ञापन में गणेश जैसे पवित्र देवता को दिखाना सर्वथा गलत ही नहीं है बल्कि असंख्य लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ है। विडम्बनापूर्ण तो यह है कि इस विज्ञापन पर ऐतराज जताने एवं विरोध प्रदर्शन करने एवं विरोध के कारण से अवगत कराने के बावजूद विज्ञापन जारी रखा गया है। यह एक तरह की हठधर्मिता है, अन्तर्राष्ट्रीय भावनाओं का अनादर है। दुनिया के शाकाहार जगत में इस घटना को गंभीरता से लिया गया है। ऐसे दुष्प्रचार पर तुरन्त रोक लगाई जानी चाहिए। यह घटना उन लोगों के लिए भी सबक है जो धर्म के नाम पर निर्दोष पशु-पक्षियों को मौत के घाट उतारकर मांस के चटखारे लेते हैं।

बात ऑस्ट्रेलिया की ही नहीं है बल्कि भारत में भी इस तरह के जानबूझकर एक धर्म-विशेष की भावनाओं को कुचलने का षडयंत्र होता रहा है। भगवान महावीर एवं महात्मा गांधी के देश में मांसाहार को बल देने के लिये बहुसंख्य समाज की आस्था को नजरअंदाज किया जाता है, यह दुर्भाग्यपूर्ण है। हम किस मुंह से ऑस्ट्रेलिया पर दवाब बनाये? हमारे देश में केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकारें ”मीट टैक्नोलाॅजी मिशन“ स्थापित करती रही है ताकि मांस का उत्पादन बढ़ाया जा सके। अनेक बीजों का उत्पादन देश में बढ़ाया गया है। हरित क्रांति के अन्तर्गत गेहूं, चावल आदि का उत्पादन संकर बीजों के माध्यम से बढ़ाया गया। श्वेत क्रांति (आपरेशन फ्लड) के अन्तर्गत गायों की नस्ल सुधार कर दूध उत्पादन बढाया गया। अण्डों में शाकाहारी अण्डांे का उत्पादन  बढ़ाकर अधिक अण्डे खाने के लिए जोरशोर से प्रचार किया जाता रहा है। ”मीट टैक्नोलाॅजी“ के अन्तर्गत मीट के उत्पादन वृद्धि क्या-क्या नहीं होती? अधिक पशु बलि यानि निरीह और बेजुबान पशुओं को पैनी मशीनों द्वारा काटने की साफ-सुधरी और सुगम व्यवस्था। सोचकर किसी भी अहिंसा में विश्वास रखने वाले व्यक्ति का हृदय कांप उठेगा। उनका भी, जो यह व्यवस्था करेंगे, यदि वे क्षणभर को उन कटने वाले पशुओं की कतार में स्वयं को खड़ा हुआ महसूस करें।

हमारे यहां बूचड़खानों का विकास एवं उनको प्रोत्साहन देने के व्यापक उपक्रम होते रहे है। हिंसा का तकनीकीकरण और व्यावसायीकरण। फिर सिद्धांत कब तक जीवित रह पाएंगे? सिद्धांत और व्यवसाय के बीच भेदरेखा होते हुए भी सिद्धांतहीन व्यवसाय भौतिक स्तर पर चाहे समृद्धि ले आए पर सैद्धांतिक दरिद्रता अवश्य ही लाएगा। क्योंकि गरीब वह नहीं, जिसके पास धन नहीं अपितु वह है जो अधिक धन रखना चाहता है। भूखा वह नहीं, जिसे भोजन नहीं मिला अपितु वह है जो भोजन में स्वाद चाहता है।

हिन्दू देवी-देवताओं का उपयोग न केवल मांसाहार के प्रचार के रूप में बल्कि कभी चप्पलों तक में उनकी तस्वीरों का इस्तेमाल किया जाता रहा है। कभी टी-शर्ट तो कभी महिलाओं के वस्त्रों में उनका उपयोग घटिया एवं सिद्धान्तहीन लाभ की भावना से होता रहा है। सेलेब्रिटी हेयर स्टाइलिस्ट जावेद हबीब को तो हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरों वाले विज्ञापन से अपना प्रचार करना महंगा साबित हुआ। हबीब ने अखबार में दिए अपने सैलून के विज्ञापन में हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरों के साथ लिखा था कि ‘देवी-देवता भी जेएस सैलून में आते हैं।’ इस विज्ञापन को एक एडवोकेट ने सोशल नेटवर्किंग साईट पर देखा तो उसे ये नागवार गुजरा और उसने इसे हिन्दू देवी देवताओं का अपमान माना और जावेद हबीब के खिलाफ केस दर्ज करवाया। पुलिस में दी शिकायत में आरोप लगाया गया है कि हबीब ने अखबार में दिए अपने सैलून के विज्ञापन में हिंदू देवी-देवताओं का अपमान किया है। आइपीसी की धारा 295ए -किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से अपमानित करने के इरादे से किया गया काम, के तहत मामला दर्ज किया है।

आखिर हम इतने असंवेदनशील क्यों हो गये हैं? बात ऑस्ट्रेलिया की है। वहां जो भी हुआ, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन वहां रह रहे भारतीय समुदाय के लोग धन्यवाद के पात्र हैं कि वे सात समन्दर पार भी अपनी पावन संस्कृति के प्रति जागरूक हैं तथा सत्य के पक्ष में सत्ता के विरुद्ध एकजुट होकर अपना विरोध दर्ज कराया हैं।