शहरी बेघरों के बसेरे के निमित्त धन को खर्च नहीं कर रहे राज्य: उच्चतम न्यायालय

नयी दिल्ली, उच्चतम न्यायलय ने आज शहरी बेघरों के लिये बसेरे उपलब्ध कराने के निमित्त् सरकारी धन के उपयोग का आडिट कराने की हिमायत करते हुये कहा कि राज्य इस मद पर धन खर्च नहीं कर रहे हैं और इस वजह से बेघर लोग परेशान हो रहे हैं।

शीर्ष अदालत ने केन्द्र द्वारा राज्यों को राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन के तहत दिये गये धन के आडिट की आवश्यकता पर जोर देते हुये कहा कि यह काम संभवत: नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक से कराया जा सकता है। न्यायालय ने कहा कि एक कार्य विशेष के लिये उपलब्ध कराये गये धन का उपयोग दूसरे काम में नहीं किया जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने कहा कि इस तरह का आडिट जरूरी है क्योंकि शीर्ष अदालत द्वारा पूर्व न्यायाधीश कैलाश गंभीर की अध्यक्षता में नियुक्त समिति इस पहलू पर गौर नहीं करेगी। न्यायालय ने इस तरह के बसेरों की उपलब्धता की सत्यता का पता लगाने के लिये दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति कैलाश गंभीर की अध्यक्षता में यह समिति गठित की है।

सालिसीटर जनरल रंजीत कुमार ने पीठ के समक्ष कहा कि राज्यों द्वारा पिछली अवधि में इस मद में 412 करोड रूपए खर्च नहीं किये जबकि केन्द्र ने 2017-18 के लिये 228 करोड रूपए जारी किये हैं।

पीठ ने कहा, ‘‘ एक बात तो यह है कि आप (केन्द्र) धन देते हैं और राज्य उसे खर्च नहीं करते हैं। वर्ष 2017-18 के लिये आपने 228 करोड रूपए दिये हैं। आप राज्यों से कहें कि हम आपको धन दे रहे हैं और आप इसे खर्च नहीं कर रहे हैं। अत: हम आपको और धन क्यों दें।’’ पीठ ने यह भी कहा, ‘‘राज्यों ने यह धन खर्च नहीं किया और बेघर लोग परेशान हो रहे हैं। आप यह कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं कि धन खर्च हुआ है? यह धन दूसरे कार्यो में नहीं लगाया जाना चाहिए क्योंकि यह एक विशेष प्रयोजन के लिये दिया गया है।’’ सुनवाई के दौरान कुमार ने कहा कि केन्द्र इस योजना के लिये 60 प्रतिशत धन का योगदान करता है जबकि शेष राशि राज्यों को वहन करनी है। जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों के लिये यह अनुपात 90 और 10 का है।

पीठ ने कहा, ‘‘आडिट आवश्यक है। समिति खातों का आडिट नहीं करेगी। यह काम संभवत: नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) कर सकते हैं।’’ न्यायालय ने सालिसीटर जनरल से कहा कि इस योजना के तहत 790 शहर आते हैं और सारे शहरों की निगरानी संभव नहीं होगा। पीठ ने सालिसीटर जनरल से कहा, ‘‘हम दो काम कर सकते हैं। पहला तो यह कि उच्च न्यायालयों से अपने राज्यों का हाल देखने के लिये कहा जाये। दूसरा विकल्प यह है कि उच्च न्यायालय से कहने की बजाये हम खुद इसे देखें।’’ इस पर कुमार ने कहा कि बेहतर होगा यदि उच्च न्यायालय से इन पर गौर करने के लिये कहना बेहतर विकल्प होगा क्योकि वे सरकार और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की सहायता भी ले सकते हैं।

न्यायालय इस मामले में अब 13 अक्तूबर को आगे विचार करेगा।