गौरी लंकेश की हत्या पर गंदी राजनीति

कर्नाटक की पत्रकार गौरी लंकेश (55) की जघन्य हत्या का मामला उसी तरह राष्ट्रीय स्तर पर उबाल का कारण बना है जैसा दो वर्ष पूर्व कन्नड़ लेखक एम.एम. कलबुर्गी की हत्या के समय बना था। भारत सदियों से विभिन्न विचारों, मत-मतांतरों का समाज रहा है। एक हिन्दू धर्म में ही अनेक शाखाएं हैं और उनमें आपस का अंतर्विरोध है। विचारांें से असहमति और मतभेद के साथ जीना एक स्वस्थ समाज का लक्ष्ण है और भारत ऐसा ही समाज रहा है। इसलिए सहसा विश्वास नहीं होता कि वैचारिक विरोध के कारण कोई किसी की इस तरह निर्दयता से सरेआम हत्या कर दे। लेकिन एक वर्ग हमारे देश में ऐसा है जिसने गौरी लंकेश की हत्या के साथ ही यह निष्कर्ष निकाल दिया कि यह तो उन्हीं लोगों का कारनामा है जिनके खिलाफ गौरी लिखती और बोलती थी। गौरी लंकेश की साप्ताहिक कन्नड़ टैबलॉइड लंकेश पत्रिके भाजपा और संघ विरोधी तीखे लेखन के लिए एक वर्ग में जाना जाता था। जिस दिन उनकी हत्या हुई उसके पहले अपने अंतिम संपादकीय में फेक न्यूज के नाम से जो संपादकीय उन्होंने लिखा उसमें सारे फेक न्यूज के लिए संघ और तथाकथित मोदी भक्तों को जिम्मेवार ठहराया। इसके लिए उन्होंने अनेक उदाहरण दिए जिनमें से कई निराधार भी थे और असत्यापित भी। किंतु उन्हांेंने लिखा। यह उनका तरीका था। बहुत सारे एक्टिविस्ट पत्रकार ऐसे ही काम करते हैं।

 उनका लिखने और बोलने का तरीका जो भी रहा हो, उनके विचार जैसे भी रहे हों, विचार का विरोध विचार से होना चाहिए, हिंसा से नहीं। हत्या से बड़ा जघन्य पाप तो कुछ हो ही नहीं सकता। किंतु सवाल तो यही है कि क्या वाकई गौरी लंकेश की हत्या उनके विचार के विरोधियों ने किया है? और वे विरोधी वही हैं जिनके खिलाफ उन्होंने सबसे ज्यादा लिखा और बोला है यानी संध परिवार? वो लगातार सोशल मीडिया पर सक्रिय थी। कहा जा रहा है कि कभी उन्होंने किसी प्रकार की धमकी मिलने की बात नहीं की। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया, जो उन्हें एवं उनके परिवार को अच्छी तरह जानते थे, ने भी कहा है कि कुछ ही दिनों पहले गौरी लंकेश उनसे मिली थी लेकिन उसने किसी खतरे की बात नहीं की थी। बेंगलूरु पुलिस में भी उन्होंने जान को खतरा होने की कभी शिकायत नहीं की थी। सिद्धारमैया सरकार के मुखिया हैं और प्रदेश में कानून व्यवस्था की जिम्मेवारी उनकी है। हो सकता है अपने बचाव के लिए उन्होंने यह बयान दे दिया हो ताकि उनसे कोई यह न पूछे कि सरकार ने गौरी की सुरक्षा के लिए व्यवस्था क्यांे नहीं की। कुछ भी हो सकता है।

हमारे देश में एक विचित्र स्थिति है। अभी मुख्यमंत्री ने विशेष जांच दल यानी सिट का गठन किया है। सिट ने काम करना आरंभ किया है। उसने न तो कोई बयान दिया है और न हत्यारों के संबंध में कोई संकेत तक दिया। बावजूद इसके इस देश के कुछ स्वनामधन्य नेताओं, पत्रकारों और एक्टिविस्टों को पता चल गया कि उनकी हत्या तो हिन्दुत्ववादी शक्तियों ने किया है। हिन्दुत्ववादी शक्तियों में भी इनका इशारा भाजपा एवं संघ से ही होता है। यही बात एम. एम. कलबुर्गी की हत्या के बाद कही गई। खूब धरना प्रदर्शन हुए। आज दो वर्ष हो गए। कर्नाटक की पुलिस यह पता लगाने में असमर्थ है कि कलबुर्गी की हत्या किसने की। महाराष्ट्र के पुणे और कोल्हापुर में क्रमशः नरेन्द्र दाभोलकर एवं गोविन्द पनसारे की हत्या हुई। उसे भी हिन्दूत्वादी शक्तियों का अपराध बता दिया गया। दाभोलकर की हत्या की जांच सीबीआई कर रही है, लेकिन वह भी किसी निष्कर्ष तक नहीं पहंुंची है। यही हालत पनसारे की हत्या के संदर्भ में है। अभी तक इनमें से किसी हत्या में किसी व्यक्ति या संगठन का हाथ जांच एजेंसियों को दिखा नहीं है लेकिन विरोधियों को दिख गया। मानो इनके पास तीसरा नेत्र हो। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने तो अपने बयान में कह दिया है कि जो भी भाजपा या संघ के विचार का विरोध करता है उस पर दबाव बनाया जाता है, उसे पीटा जाता है, उस पर हमला किया जाता है और उसे मार भी दिया जाता है। माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी ने भी इसे संघ परिवार की सुनियोजित हिंसा कहा है।

ये दोनों देश के बड़े नेता हैं। इनसे पूछा जाना चाहिए कि आपने जो जघन्य आरोप लगाए हैं उनके प्रमाण आपके पास हैं क्या? जाहिर है, इनके पास कोई प्रमाण नहीं हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के संगठनों के विचार से असहमत होना अस्वाभाविक नहीं है। उसके आप घोर विरोधी भी हो सकते हैं। किंतु निष्पक्षता से विचार करने पर यह बात गले नहीं उतरती कि 92 साल से सक्रिय कोई संगठन अपने विरोध में लिखने और बोलने वाले की हत्या करे। जैसा गौरी लंकेश लिखतीं थीं वैसा दूसरे लोग भी लिखते और बोलते हैं। तब तो भारत में न जाने कितने पत्रकारों और लेखकों की हत्या हो जाएगी। संघ और भाजपा के खिलाफ लिखने और बोलने वालों की छोटी संख्या तो है नहीं। आज तक संघ का कोई कार्यकर्ता संगठन के खिलाफ लिखने और बोलने वालों के खिलाफ हत्या करने के अपराध में पकड़ा नहीं गया। इसलिए इस तरह का आरोप केवल राजनीति है और यह दुर्भाग्यपूर्ण है। सच कहा जाए तो इससे जांच एजेंसियों पर भी दबाव पड़ता है। राहुल गांधी जैसे नेता कोई बात बोल दें और प्रदेश में उनकी सरकार है तो क्या जांच पर इसका असर नहीं होगा? अवश्य होगा। आज यह स्वीकारने में कोई आपत्ति नहीं है कि चाहे दाभोलकर हो, पंसारे या कलबुर्गी उनके हत्यारे संभवतः इसीलिए नहीं पकड़े जा सके, क्योंकि जांच की एक दिशा नेताओं, पत्रकारों और एक्टिविस्टों के दबाव में निर्धारित हो गई।

गौर लंकेश के भाई इन्द्रजीत लंकेश ने साफ कहा है कि उन्हें बेेगलूरु पुलिस पर विश्वास नहीं है। उन्होंने कलबुर्गी हत्याकांड की वर्तमान परिणति की चर्चा करते हुए कहा है कि आज उनका परिवार निराश होकर सीबीआई जांच की मांग कर रहा है। इसलिए हमारी भी मांग है कि हत्या की जांच सीबीआई करे। परिवार ने किसी संगठन या विचार पर आरोप नहीं लगाया है। हालांकि इन्द्रजीत और गौरी के बीच अच्छे रिश्ते नहीं थे। प्रेस के स्वामित्व को लेकर दोनों में विवाद था। उनका परिवार जाना माना है। उनके पिता पी लंकेश कन्नड़ के नामी फिल्मकार और पत्रकार भी थे। उन्होंने ही 1980 में लंकेश पत्रिके की शुरुआत की। गौरी की छोटी बहन कविता कन्नड़ अभिनेत्री है और उसने कई पुरस्कार प्राप्त किया है। तो परिवार भी प्रभावी है। अगर निष्पक्ष होकर दो टूक शब्दांे में कहा जाए तो गौरी की हत्या प्रदेश सरकार की कानून और व्यवस्था पर प्रश्न खड़ा करता है। राहुल गांधी को अपने मुख्यमंत्री से पूछना चाहिए कि उनके राज्य में ऐसा क्यों हुआ? यह काम उन्होेंने कलबुर्गी की हत्या के समय भी नहीं किया। हत्या आपकी सरकार के अंदर हो और आरोप आप भाजपा और संघ पर लगाए। दाभोलकर की हत्या भी तो महाराष्ट्र में कांग्रेस शासनकाल के दौरान ही हुआ। आश्चर्य की बात है कि गौरी लंकेश की हत्या पर आसमान उठाने वाला कोई नेता, एक्टिविस्ट एवं पत्रकार इस पहलू को नहीं उठा रहा। क्यों? गौरी लंकेश ने कुछ माओवादियों को आम जिन्दगी मंे लाने का भी काम किया था। इस नाते माओवादी भी उसके खिलाफ हो सकते थे। उन्होंने कांग्रेस नेता डी. शिवकुमार के कथित भ्रष्टाचार के बारे में बहुत कुछ लिखा था। ये वही शिवकुमार हैं जिन्होंने गुजरात के कांग्रेस विधायकों की मेजबानी की थी एवं जिनके यहां छापा पड़ा था। वो भी तो उनके खिलाफ हो सकते हैं। अगर कोई इन पहलुओं को नहीं उठा रहा है तो इसे किसी की हत्या पर गंदी राजनीति नहीं तो और क्या कहेंगे?

आपको संघ परिवार का विरोध करना है तो अवश्य करिए। उसके लिए अनेक मंच और अवसर आते रहते हैं। किंतु किसी की हत्या को उसके सिरे बांधने का अपराध मत कीजिए। हत्या की निष्पक्ष और त्वरित जांच की मांग अवश्य होनी चाहिए, उसके लिए जितना दबाव बनाना है बनाए जाए….किंतु जांच के पहले ही निष्कर्ष निकाल लेना यह केवल दुराग्रह हो सकता है जिससे जांच प्रभावित होता है, देश का वातावरण बिगड़ता है तथा विश्व में भारत की छवि खराब होती है। पाकिस्तान के अखबारों ने लिख दिया कि हिन्दू कट्टरपंथियों ने एक पत्रकार की इसलिए हत्या कर दी कि वह उनके खिलाफ लिखती थी।

-अवधेश कुमार

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