जड़ों को सघन बनाने की तकनीक सरसों की ऊपज डेढ़गुना हो सकती है : विशेषज्ञ

नयी दिल्ली,  कृषि विशेषज्ञों ने आज कहा कि जड़ो को सघनता बढ़ाने की कृषि प्रणाली :एसआरआई: ने किसानों को सरसों की ऊपज को बढ़ाने में मदद की है। उन्होंने दावा किया कि इस तकनीकी का व्यापक इस्तेमाल से देश की खाद्य तेल के आयात पर होने वाले खर्च में भारी कमी ला सकता है।

‘अलायंस फॉर सस्टेनेबल एंड होलिस्टिक एग्रीकल्चर’ :आशा: की कविता कुरुगंती ने कहा कि इस तकनीक को ओड़िशा, छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार और झाारखंड के कुछ किसानों द्वारा अपनाया गया जिसके बाद सरसों की प्रति हेक्टेयर ऊपज बढ़कर 57 क्विन्टल प्रति हेक्टेयर हो गयी है।

आलू, मूली और मटर के साथ अपने खेत में सरसों उगाने के लिए एसआरआई तकनीक को अपनाने वाली ओड़िशा की एक किसान महिला, फेलिसिटा टोपनो ने संवाददाता सम्मेलन में अपने अनुभवों को साझा किया।

टोपनो ने कहा, ‘‘हमने प्रति हेक्टेयर 31 क्विन्टल की औसत ऊपज हासिल किया।’’ मध्य प्रदेश कृषि विभाग के उप निदेशक राजेश त्रिपाठी ने कहा कि उमारिया और बालाघाट जिले में इस प्रयोग ने अच्छी परिणाम दिखाये हैं जहां इसे हजारों किसानों के द्वारा अपनाया गया है।

उन्होंने कहा, ‘‘हमने पांच किसानों को आमंत्रित किया जिनको धान और चावल उगाने के लिए प्रशिक्षित करने के लिए एसआरआई तकनीक का इस्तेमाल किया गया। अब यह तकनीक प्रदेश के 10 जिलों में अपनाया गया है।’’ उन्होंने कहा कि उमारिया में सरसों की ऊपज अधिक यानी 57 क्विन्टल प्रति हेक्टेयर थी।

एसआरआई तकनीक में नर्सरी तकनीक के जरिये सरसों पौध की दूरी को बनाकर जड़ों के विकास को प्रोत्साहित करने के लिए पारिस्थिकी और जैविक रास्तों को अपनाया जाता है।

कुरुगन्ती ने कहा कि भारत 70,000 करोड़ रुपये के रेपसीड. सरसों का प्रतिवर्ष आयात करता है जिसे देश में ऊपज बढ़ाने के लिए एसआरआई तकनीक को अपनाने के लिए प्रभावी विस्तार प्रणाली स्थापित कर काफी कम किया जा सकता है।