युद्ध का अंधेरा नहीं, शांति का उजाला हो

भूटान के दावे वाले डोकलाम में भारत और चीन की सेनाओं के बीच जारी तनातनी जिस तरह खत्म हुई वह भारतीय कूटनीति की एक बड़ी कामयाबी है। इससे न केवल भारत का अंतरराष्ट्रीय कद बढेगा, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि एक साहसी लेकिन अहिंसक नेता के रूप में सामने आयेंगी। उन्होंने अपने निर्णयों से यह सिद्ध किया है कि वे भारतीय हितों की रक्षा के लिए किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम हैैं। वे दोस्ती, विश्वशांति एवं सह-अस्तित्व भावना को लेकर ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेने चीन जा रहे हैं, निश्चित ही व्यापारिक हितों के साथ-साथ राजनैतिक संबंधों में प्रगाढ़ता आयेगी।

ललित गर्ग

डोकलाम में भारत व चीन की सेनाओं के बीच बढ़ते तनाव को शांत करने में सफलता मिलने का अर्थ है कि युद्ध की आशंकाओं पर विराम लगना। इस स्थिति का बनना दोनों ही राष्ट्रों के लिये शुभ एवं श्रेयस्कर है। डोकलाम विवाद की छाया जहां चीन के लिए हर लिहाज से नुकसानदेह थी, वहीं भारत भी बिना वजह युद्ध नहीं चाहता। जो भी हो, इस फैसले से दोनों मुल्कों की जनता को राहत मिली है। दो परमाणु शक्ति संपन्न ताकतवर पड़ोसियों के बीच इस तरह तनाव बने रहना खुद में एक असाधारण और अति-संवेदनशील मामला था। यह दुनिया की एक बड़ी आबादी को हर समय विनाश की संभावनाओं पर कायम रखने जैसा था। ऐसे युद्ध का होना विजेता एवं विजित दोनों ही राष्ट्रों को सदियों तक पीछे धकेल देता, इससे भौतिक हानि के अतिरिक्त मानवता के अपाहिज और विकलांग होने का भी बड़ा कारण बनता।

डोकलाम में शांति का उजाला हुआ है, अभय का वातावरण, शुभ की कामना और मंगल का फैलाव कर दोनों ही देशों को विकास के समुचित अवसर और साधन की संभावना दी है। मनुष्य के भयभीत मन को युद्ध की विभीषिका से मुक्ति दी है। स्वयं अभय बनकर विश्व को निर्भय बनाया है। निश्चय ही यह किसी एक देश या दूसरे देश की जीत नहीं बल्कि समूची मानव-जाति की जीत हुई है। लगभग तीन महीने से चला आ रहा गतिरोध समाप्त हो गया है। इस अवधि में चीन ने न केवल भारत बल्कि विश्व को तनाव और त्रास का वातावरण दिया, अनिश्चय और असमंजस की विकट स्थिति दी। यह समय की नजाकत को देखते हुए जरूरी था और इस जरूरत को महसूस करते हुए दोनों देश डोकलाम से अपनी-अपनी सेनाएं हटाने के लिए तैयार हो गए हैं।

अब तक चीन कह रहा था कि भारत डोकलाम से पहले अपनी सेना हटा ले, उसके बाद ही कोई बातचीत होगी। भारत का कहना था कि दोनों देश एक साथ अपनी सेना वापस बुलाएं, उसके बाद वार्ता संभव है। चीन ने आखिरकार भारत की यह बात मान ली है। मामला तब शुरू हुआ जब भारत ने डोकलाम में चीन के सड़क बनाने की कोशिश का विरोध किया। जबकि चीन सड़क बनाने की जिद पर अड़ा हुआ था और कह रहा था कि उसे अपनी सीमा में निर्माण कार्य करने से कोई नहीं रोक सकता, जबकि भूटान का कहना था कि डोकलाम पठार उसके नियंत्रण में है और कानूनी तौर पर उसी का कब्जा है, जबकि चीन दावा कर रहा था कि यह उस चुम्बी घाटी का हिस्सा है जो उसके कब्जे में है। इसके साथ ही चीन यह भी स्वीकार कर रहा था कि डोकलाम विवाद को सुलझाने के लिए उसके और भूटान के बीच वार्ता तंत्र स्थापित है इसके बावजूद उसने अपनी सेना को बुलडोजरों के साथ डोकलाम पठार पर निर्माण कार्य करने के आदेश दे दिये थे।

भारत और भूटान के बीच 1949 से चली आ रही विशेष संधि के तहत उसकी राष्ट्रीय सीमाओं की रक्षा की जिम्मेदारी भारतीय सेनाओं की ही बनती है जिसको लेकर भूटान ने भारत से गुहार लगाई और भारत ने अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए अपनी सेनाओं को इलाके की निगरानी में लगा दिया। इसके साथ ही भारत ने चीन को चेताया कि डोकलाम में सड़क बनाने से उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा को भी भारी खतरा पैदा हो सकता है, क्योंक प. बंगाल के दार्जिलिंग से उत्तर-पूर्वी राज्यों को जोड़ने वाली संकरी सड़क चीन द्वारा बनाई जा रही सड़क से कुछ ही किमी दूरी पर रह जाएगी। इस आपत्ति पर चीन भड़क गया, उसने चीनी मीडिया के माध्यम से भारत को युद्ध की धमकी तक दी। लेकिन भारत ने अपना धैर्य नहीं खोया, संयम रखा और इस समस्या का कूटनीतिक हल तलाशना जारी रखा। सच यही है कि भारत जो चाहता था उसे मानने के लिए चीन राजी होना पड़ा। यह चीन का अहंकार एवं अंधापन ही है कि वह पहले दिन से ही ऐसे व्यवहार कर रहा था जैसे भारत उसके समक्ष कुछ भी नहीं। यथार्थ यह है कि अंधकार प्रकाश की ओर चलता है, पर अंधापन मृत्यु-विनाश की ओर। लेकिन भारत ने अपनी शक्ति एवं सामथ्र्य का अहसास करा दिया।

                वैसे भी अगले महीने चीन में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन होने जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ब्रिक्स देश जिनमें भारत, रूस, ब्राजील, चीन, द. अफ्रीका संगठन की शीर्ष बैठक में हिस्सा लेने चीन जा रहे हैं। इस संगठन में ये केवल पांच देश ही हैं और इनके आपसी सहयोग से दुनिया में समानान्तर शक्तिशाली ध्रूव तैयार हो सकता है। ये पांचों ही देश विश्व की तेजी से विकास करती अर्थव्यवस्था वाले देश हैं। इन पांचों में से दो देशों की बीच यदि विवादों का स्तर सैनिक समाधान की हद तक पहुंचता है तो इस संगठन की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़ा किया जा सकता है। इस दृष्टि से भी चीन का डोकलाम से सेना हटाने या उसकी तैनाती में संशोधन का प्रस्ताव स्वीकार करने को बाध्य होना पड़ा। वह कूटनीतिक रूप से कमजोर पाले में होने की वजह से भी उसे इस तरह समझौते के लिये विवश होना पड़ा। चीन पर भारत के साथ शान्तिपूर्ण संबंध बनाये रखने की ऐतिहासिक जिम्मेदारी भी है, क्योंकि 1962 में जब उसने अपनी सेनाएं हमारे असम के तेजपुर तक में भेज दी थीं तब भी अंतर्राष्ट्रीय दबाव में पीछे हटना पड़ा था। कूटनीतिक मोर्चे पर यह कोई छोटी घटना नहीं थी बावजूद इसके कि भारत युद्ध में बुरी तरह हार गया था।

                चीन का यह अहंकार ही है कि वह भारत को बार-बार कमजोर समझने की भूल करता है। बुरा आदमी और बुरा हो जाता है जब वह साधु बनने का स्वांग रचता है। चीन ऐसा ही महसूस कराता रहा है। यह उसका अहंकार ही है कि शांति की बात करते हुए अशांति की दिशा में बढ़ता है। चीन को मजबूरन यह फैसला लेना पड़ा क्योंकि मौजूदा हालात उसके पक्ष में नहीं हैं। वह एक साथ कई मोर्चों पर उलझा हुआ है। दक्षिणी चीन सागर को लेकर अमेरिका से उसका तनाव बहुत बढ़ गया है। ऐसे में भारत से तनाव जारी रखना उसके लिए घाटे का सौदा हो सकता था। उसके व्यापारिक और निवेश हित भारत के साथ काफी गहरे हो चुके हैं। इस मोर्चे पर होने वाला कोई भी नुकसान चीनी अर्थव्यवस्था के लिए समस्या पैदा कर सकता था। सबसे बुनियादी वजह यह है कि एक से एक विनाशकारी हथियारों की मौजूदगी के कारण युद्ध अव्यावहारिक हो गए हैं, भले सामरिक रणनीति का खेल चलता रहता हो। दूसरे, चीन को धीरे-धीरे लगने लगा था कि दबाव बनाने की रणनीति और डराने-धमकाने की भाषा नहीं चलेगी। अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसके खिलाफ है और अमेरिका समेत तमाम देश डोकलाम गतिरोध दूर होने का इंतजार कर रहे हैं। भारत और चीन आज हजारों मजबूत धागों से एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं। दोनों के बीच का सीमा विवाद भी ऐसा नहीं है कि रोजमर्रा का जीवन उससे प्रभावित होता हो या उस पर दोनों देशों का बहुत कुछ दांव पर लगा हो। यह ऐसा मसला है जिस पर शांति और सौहार्द के माहौल में बात होती रह सकती है। सामरिक दृष्टि से चाक-चैबंद रहने का हक भारत और चीन दोनों को है, लेकिन जिम्मेदार राष्ट्र होने के नाते दोनों के ऊपर क्षेत्र में अमन-चैन बनाए रखने की जवाबदेही भी है।

भारत ने चीन पर जो कूटनीतिक जीत हासिल की उसका संदेश उसकी चैधराहट से परेशान उसके पड़ोसी देशों के साथ-साथ समूची विश्व बिरादरी को भी जाएगा। चीन ने जिस तरह अपना चेहरा बचाते हुए अपने कदम पीछे खींचे उसका एक मनोवैज्ञानिक लाभ यह भी होगा कि भारत की आम जनता युद्ध की कड़वी यादों को भूल कर आत्मविश्वास से लैस होगी। इस सबके बावजूद चीन से सतर्क रहने में ही समझदारी है। क्योंकि जब तक चीन के अहंकार का विसर्जन नहीं होता तब तक   युद्ध की संभावनाएं मैदानों में, समुद्रों में, आकाश में भले ही बन्द हो जाये, दिमागों में बन्द नहीं होती। इसलिये आवश्यकता इस बात की भी है कि कि जंग अब विश्व में नहीं, हथियारों में लगे। मंगल कामना है कि अब मनुष्य यंत्र के बल पर नहीं, भावना, विकास और प्रेम के बल पर जीए और जीते।