‘मन के हारे हार है , मन के जीते जीत ’: ‘शूटर दादी’ चन्द्रो तोमर

नयी दिल्ली,  उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के जौहड़ी गांव की रहने वाली 85 वर्षीय वयोवृद्ध निशानेबाज चन्द्रो तोमर का कहना है कि हमारी लक्ष्य प्राप्ति की राह में हमेशा शरीर से ज्यादा मन बाधा पैदा करता है। कई बार हम शरीर से ज्यादा मन से हार मान लेते है। दुनिया की हर बड़ी हस्ती की उपलब्धियों के पीछे उसका दृढ़ संकल्प ही होता है। यदि हम मन में दृढ़ संकल्प करके अपने प्रगति-पथ पर आगे बढते हैं तो हमें लक्ष्य प्राप्ति से दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती।

‘‘शूटर दादी और ‘‘रिवॉल्वर दादी’’ के नाम से मशहूर चन्द्रो तोमर ने ‘‘भाषा’’ से विशेष बातचीत में अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उनका शूटिंग की दुनिया में आना एक संयोग मात्र था। पहली बार जब वह अपनी पोती के एडमिशन के लिए शूटिंग एकेडमी गयीं तो पोती ने रिवॉल्वर से डर के कारण अभ्यास करने से मना करते हुए जिद की कि पहले वह निशाना लगाकर दिखाये। तब तत्कालीन कोच के आग्रह पर उन्होंने पहली बार 1999 में 65 वर्ष की उम्र में निशाना साधने के लिए रिवॉल्वर उठायी और संयोग से पहला ही निशाना सीधे लक्ष्य पर सटीक लगा। फिर लगातार दूसरा और तीसरा निशाना भी सटीक लगने से उत्साहित होकर पोतियों के साथ उन्होंने भी धीरे-धीरे अभ्यास करना शुरू कर दिया। तब से आज तक कई राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने और 30 से ज्यादा पदक जीतने के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

चन्द्रो ने बताया कि उन्होंने अपने पिछले 20 साल से ज्यादा समय के कैरियर में शूटिंग के अभ्यास के साथ-साथ पूरे देश में गांवों की गरीब, अशिक्षित, वंचित और पिछड़े वर्ग की महिलाओं को जगाने का भी काम किया है। वह देश के हर कोने में संचालित होने वाले प्रशिक्षण शूटिंग रेंजों में जाकर अभ्यास कर रही लड़कियों और महिलाओं का हौसला अफजाई भी करती रही हैं। उन्होंने हमेशा अपनी कठोर मेहनत और अभ्यास पर ही जोर दिया जिसकी बदौलत वह आज इस मुकाम पर हैं। आज उनका परिवार और गांव भी शूटिंग के कारण पूरे देश में पहचान रखता है। उन्होंने कहा ,‘‘तब मेरी उम्र, भाषा और ग्रामीण परिवेश सहित असफल होने की कई संभावनाएं थी मगर एक जिद ने मुझे सफल बना दिया।’’ दादी ने कहा कि जब वह पहली बार 1999 में 65 वर्ष की उम्र में अभ्यास करती थी तो गांव और आस-पड़ोस के मोहल्लों के लोग उनका खूब मजाक बनाते थे। तब भारत-पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध छिड़ा हुआ था। लोग तंज कसते थे कि बुढिया सीमा पर युद्ध करने के लिए जायेगी लेकिन उन्होंने इन नकारात्मक बातों की तरफ ध्यान देकर अपना उत्साह कम करने के बजाय लक्ष्य पर ही ध्यान केन्द्रित किया।

उन्होंने बताया कि तब के समय की तुलना में अब समाज भी ज्यादा जागरूक हो गया है और महिलाओं के प्रति स्वीकार्यता भी बढ़ी है लेकिन अभी भी बहुत ज्यादा प्रयास करने की जरूरत है। समाज के साथ-साथ सरकार को भी लड़कियों को शूटिंग एवं अन्य खेलों के प्रति प्रोत्साहित करने की दिशा में कदम उठाने होंगे। इसके लिए समाज और सरकारों को शिक्षा के समान खेलों के प्रति भी सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना होगा और खेल नीति में प्रावधान करने होंगे।