स्वतंत्रता को दें नया आयाम

पन्द्रह अगस्त हमारे राष्ट्र का गौरवशाली दिन है, इसी दिन स्वतंत्रता के बुनियादी पत्थर पर नव-निर्माण का सुनहला भविष्य लिखा गया था। इस लिखावट का हार्द था कि हमारा भारत एक ऐसा राष्ट्र होगा जहां न शोषक होगा, न कोई शोषित, न मालिक होगा, न कोई मजदूर, न अमीर होगा, न कोई गरीब। सबके लिए शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा और उन्नति के समान और सही अवसर उपलब्ध होंगे। आजादी के सात दशक बीत रहे हैं, अब साकार होता हुआ दिख रहा है हमारी जागती आंखों से देखा गया स्वप्न। अहसास हो रहा है स्वतंत्र चेतना की अस्मिता का। अब बन रहा  है नया भारत।

ललित गर्ग

हमें स्वतंत्रता दिवस को मनाते हुए एक ऐसे भारत को निर्मित करना है जो न केवल भौतिक दृष्टि से ही बल्कि नैतिक दृष्टि से भी सशक्त हो। स्वतंत्रता के सातवें दशक में पहुंचकर पहली बार ऐसा आधुनिक भारत खड़ा करने की बात हो रही है जिसमें नये शहर बनाने, नई सड़कें बनाने, नये कल-कारखानें खोलने, नई तकनीक लाने, नई शासन-व्यवस्था बनाने के साथ-साथ नया इंसान गढ़ने का प्रयत्न हो रहा है। एक शुभ एवं श्रेयस्कर भारत निर्मित हो रहा है।

हर बार आजादी के जश्न को मनाते हुए अनेक प्रश्न खडे़ रहे हैं, ये प्रश्न  इसलिये खड़े हुए हैं क्योंकि आज भी आम आदमी न सुखी बना, न समृद्ध। न सुरक्षित बना, न संरक्षित। न शिक्षित बना और न स्वावलम्बी। अर्जन के सारे स्रोत सीमित हाथों में सिमट कर रह गए। स्वार्थ की भूख परमार्थ की भावना को ही लील गई। हिंसा, आतंकवाद, जातिवाद, नक्सलवाद, क्षेत्रीयवाद तथा धर्म, भाषा और दलीय स्वार्थों के राजनीतिक विवादों ने आम नागरिक का जीना दुर्भर कर दिया।

हमारी समृद्ध सांस्कृतिक चेतना जैसे बन्दी बनकर रह गई। शाश्वत मूल्यों की मजबूत नींवें हिल गईं। राष्ट्रीयता प्रश्नचिन्ह बनकर आदर्शों की दीवारों पर टंग गयी। आपसी सौहार्द, सहअस्तित्व, सहनशीलता और विश्वास के मानक बदल गए। घृणा, स्वार्थ, शोषण, अन्याय और मायावी मनोवृत्ति ने विकास की अनंत संभावनाओं को थाम लिया।

स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, लेकिन इसका स्वाद हम चख ही नहीं पाए। ऐसा लगता रहा है कि जमीन आजाद हुई है, जमीर तो आज भी कहीं, किसी के पास गिरवी रखा हुआ है। ट्रेन या सड़क दुर्घटनाएं हो या बार-बार आतंकी बम धमाकों से दहल जाना या फिर महिलाओं की सुरक्षा का प्रश्न- चहुं ओर लोक जीवन में असंतोष है, असुरक्षा का भाव है। लोकतंत्र घायल है। वह आतंक का रूप ले चुका है। मुझे अपनी मलेशिया एवं सिंगापुर की यात्रा से लौटने के बाद महसूस हुआ कि हमारे यहां की फिजां डरी-डरी एवं सहमी-सहमी है। कभी पुलिस कमिश्नर तो कभी राजनेताओं ने महिलाओं पर हो रहे हमलों, अत्याचारों के लिये उनके पहनावें या देर रात तक बाहर घुमने को जिम्मेदार ठहराया है, जबकि सिंगापुर एवं मलेशिया में महिलाओं के पहनावें एवं देर रात तक अकेले स्वच्छंद घूमने के बावजूद वहां महिलाएं सुरक्षित है और अपनी स्वतंत्र जीवन जीती है। हमें समस्या की जड़ को पकडना होगा। केवल पत्तों को सींचने से समाधान नहीं होगा। ऐसा लगता है कि इन सब स्थितियों में जवाबदेही और कर्तव्यबोध तो दूर की बात है, हमारे सरकारी तंत्र में न्यूनतम मानवीय संवेदना भी बची हुई दिखायी नहीं देती। लगभग तीन सप्ताह से चल रही संसद में विरोधी पार्टियों के द्वारा अवरोध बना हुआ है, जनता के हितों पर कुछ सार्थक निर्णय लेने के लिये चुनी गयी संसद अपने ही हितों के लिये संसद की कार्रवाही का अवरोध करना, कैसा लोकतांत्रिक आदर्श है? प्रश्न है कि कौन स्थापित करेगा एक आदर्श शासन व्यवस्था? कौन देगा इस लोकतंत्र को शुद्ध सांसे? जब शीर्ष नेतृत्व ही अपने स्वार्थों की फसल को धूप-छांव देने की तलाश में हैं। जब रास्ता बताने वाले रास्ता पूछ रहे हैं और रास्ता न जानने वाले नेतृत्व कर रहे हैं सब भटकाव की ही स्थितियां हैं।

बुद्ध, महावीर, गांधी हमारे आदर्शों की पराकाष्ठा हंै। पर विडम्बना देखिए कि हम उनके जैसा आचरण नहीं कर सकते- उनकी पूजा कर सकते हैं। उनके मार्ग को नहीं अपना सकते, उस पर भाषण दे सकते हैं। आज के तीव्रता से बदलते समय में, लगता है हम उन्हें तीव्रता से भुला रहे हैं, जबकि और तीव्रता से उन्हें सामने रखकर हमें अपनी व राष्ट्रीय जीवन प्रणाली की रचना करनी चाहिए।

गांधी, शास्त्री, नेहरू, जयप्रकाश नारायण, लोहिया के बाद राष्ट्रीय नेताओं के कद छोटे होते गये और परछाइयां बड़ी होती गईं। हमारी प्रणाली में तंत्र ज्यादा और लोक कम रह गया है। यह प्रणाली उतनी ही अच्छी हो सकती है, जितने कुशल चलाने वाले होते हैं। लेकिन कुशलता तो तथाकथित स्वार्थों की भेंट चढ़ गयी। लोकतंत्र श्रेष्ठ प्रणाली है। पर उसके संचालन में शुद्धता हो। लोक जीवन में ही नहीं लोक से द्वारा लोक हित के लिये चुने प्रतिनिधियों में लोकतंत्र प्रतिष्ठापित हो और लोकतंत्र में लोक मत को अधिमान मिले- यह वर्तमान समय की सबसे बड़ी अपेक्षा है।

भारत स्वतंत्र हुआ। आजादी के लिये और आजाद भारत के लिये हमने अनेक सपने देखें लेकिन वास्तविक सपना नैतिकता एवं चरित्र की स्थापना को देखने में हमने कहीं-ना-कहीं चूक की है। आज जो देश की तस्वीर बन रही है उसमें मानवीय एकता, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, मैत्री, शोषणविहीन सामाजिकता, अंतर्राष्ट्रीय नैतिक मूल्यों की स्थापना, सार्वदेशिका निःशस्त्रीकरण का समर्थन आदि तत्त्व  को जिस तरह की प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी वह नहीं मिली, जो कि जनतंत्र की स्वस्थता के मुख्य आधार हैं। स्वतंत्रता दिवस को मनाते हुए हमें इन तत्त्वों को जन-जन के जीवन स्थापित करने के लिये संकल्पित होना होगा। इसके लिये केवल राजनीतिक ही नहीं  बल्कि गैर-राजनीतिक प्रयास की अपेक्षा है।

हमारी सबसे बड़ी असफलता है कि आजादी के 70 वर्षों के बाद भी हम राष्ट्रीय चरित्र नहीं बना पाये। राष्ट्रीय चारित्र का दिन-प्रतिदिन नैतिक हृास हो रहा था। हर गलत-सही तरीके से हम सब कुछ पा लेना चाहते थे। अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए कत्र्तव्य को गौण कर दिया था। इस तरह से जन्मे हर स्तर पर भ्रष्टाचार ने राष्ट्रीय जीवन में एक विकृति पैदा कर दी थी। न केवल यूपीए के 10 वर्ष के शासन से बल्कि क्षेत्रीय पार्टियों एवं राज्यों में उनकी अलोकतांत्रिक एवं भ्रष्ट गतिविधियों से जनता ऊब चुकी थी और विपरीत एवं अराजक स्थितियां जनता को बार-बार अहसास दिला रही थी कि देश को एक ताकतवर नेता की जरूरत है जो कड़े त्वरित फैसले ले सके।

देश में एक ओर गरीबी, बेरोजगारी और दुष्कार की समस्या है। दूसरी ओर अमीरी, विलासिता और अपव्यय है। देशवासी बहुत बड़ी विसंगति में जी रहे हैं। एक ही देश की धरती पर जीने वाले कुछ लोग पैसे को पानी की तरह बहाएँ और कुछ लोग भूखे पेट सोएं-इस असंतुलन की समस्या को नजरंदाज न कर इसका संयममूलक हल खोजना चाहिए।

नगर में निवास करने मात्र से ही कोई सच्चा नागरिक नहीं हो जाता। यदि ऐसा होता तो नगर में तो अनेकों कीट-पतंगें और पशु-पक्षी भी रहते हैं, वे भी नागरिक कहे जाते हैं। पर बात ऐसी नहीं है। सही माने में नागरिक वह है, जिसमें सत्य, शौच, श्रद्धा, शील और समता जैसे नागरिक जनोचित सद्गुण हों। ऐसा व्यक्ति अपनी सुविधा के लिए दूसरों को कष्ट नहीं दे सकता। सबके प्रति मित्र भाव रखता है। फलतः उसका जीवन शांत और सुखी बनता है।

अधिकारों का दुरुपयोग नहीं हो, मतदाता स्तर पर भी और प्रशासक स्तर पर भी। लोक चेतना जागे। लोकतंत्र के दो मजबूत पैर न्यायपालिका और कार्यपालिका स्वतंत्र रहें। एक दूसरे को प्रभावित न करें। संविधान के अन्तर्गत बनी आचार संहिता मुखर हो, प्रभावी हो। केवल पूजा की चीज न हो। जन भावना लोकतंत्र की आत्मा होती है। लोक सुरक्षित रहेगा तभी तंत्र सुरक्षित रहेगा। लोक के लिए, लोक जीवन के लिए, लोकतंत्र के लिए जरूरत है कि उसे शुद्ध सांसें मिलें। लोक जीवन और लोकतंत्र की अस्मिता को गौरव मिले। इसी सन्देश में स्वतंत्रता की सार्थकता निहित है।

बुद्ध, महावीर और गांधी अब वापिस नहीं आ सकते। अब तो लोकतंत्र के समर्थकों को ही तुच्छ राजनीति और दलगत स्वार्थों से ऊपर उठना होगा। अहिंसा के प्रवक्ताआंे को प्रशिक्षण देना होगा। चुप्पी या बीच की लाइन को छोड़कर मतदाता को मुखर होना होगा। अन्यथा हमारा लोकतंत्र ऐसे ही लहूलुहान होता रहेगा और जिस आदर्श स्थिति की हमें तलाश है वह न हमें मिलेगी, न हमारी पीढ़ी को।

इस वर्ष हम स्वतंत्रता दिवस मनाते हुए महसूस कर रहे हैं कि निराशाओं के बीच आशाओं के दीप जलने लगे हैं, यह शुभ संकेत हैं। एक नई सभ्यता और एक नई संस्कृति करवट ले रही है। नये राजनीतिक मूल्यों, नये विचारों, नये इंसानी रिश्तों, नये सामाजिक संगठनों, नये रीति-रिवाजों और नयी जिंदगी की हवायें लिए हुए आजाद मुल्क की एक ऐसी गाथा लिखी जा रही है, जिसमें राष्ट्रीय चरित्र बनने लगा है, राष्ट्र सशक्त होने लगा है, न केवल भीतरी परिवेश में बल्कि दुनिया की नजरों में भारत अपनी एक स्वतंत्र हस्ती और पहचान लेकर उपस्थित है। चीन की दादागिरी और पाकिस्तान की दकियानूसी हरकतों को मुंहतोड़ जबाव पहली बार मिला है। चीन ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि सीमा विवाद को लेकर डोकलाम में उसे भारत के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा। यह सब प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व का प्रभाव है। उन्होंने लोगों में उम्मीद जगाई, देश के युवाओं के लिए वह आशा की किरण हैं। इसका कारण यही है कि लोग ताकतवर और तुरन्त फैसले लेने वाले नेता पर भरोसा करते हैं ऐसे कद्दावर नेता की जरूरत लम्बे समय से थी, जिसकी पूर्ति होना और जिसे पाकर राष्ट्र केवल व्यवस्था पक्ष से ही नहीं, सिद्धांत पक्ष भी सशक्त हुआ है। किसी भी राष्ट्र की ऊंचाई वहां की इमारतों की ऊंचाई से नहीं मापी जाती बल्कि वहां के राष्ट्रनायक के चरित्र से मापी जाती है। उनके काम करने के तरीके से मापी जाती है।

हमारे राष्ट्रनायकों ने, शहीदों ने एक सेतु बनाया था संस्कृति का, राष्ट्रीय एकता का, त्याग का, कुर्बानी का, जिसके सहारे हम यहां तक पहंुचे हैं। मोदीजी भी ऐसा ही सेतु बना रहे हैं, ताकि आने वाली पीढ़ी उसका उपयोग कर सके। मोदीजी चाहते हैं कि हर नागरिक इस सेतु बनाने के लिये तत्पर हो। यही वह क्षण है जिसकी हमें प्रतीक्षा थी और यही वह सोच है जिसका आह्वान  है अभी और इसी क्षण शेष रहे कामों को पूर्णता देने का, क्योंकि हमारा भविष्य हमारे हाथों में हैं। ऐसा करके ही हम स्वतंत्रता दिवस को मनाने की सार्थकता सिद्ध कर पाएंगे।