कुंवारे लोगों को सेरोगेसी के लाभ से वंचित करता है प्रस्तावित नियम

नयी दिल्ली, करण जौहर और तुषार कपूर जैसे बॉलीवुड सिलेब्रिटी सेरोगेसी की मदद से पिता होने का सुख उठा पाए लेकिन संतान सुख चाहने वाले ऐसे बाकी कुंवारे लोगों को भविष्य में इस दिशा में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। दरअसल प्रस्तावित सेरोगेसी कानून कहता है कि इस सुविधा का लाभ सिर्फ कानूनी तौर पर शादीशुदा जोड़े ही ले सकते हैं।

वकीलों और डॉक्टरों समेत कई विशेषज्ञों का मानना है कि सेरोगेसी की सुविधा के लाभ से एकल माता-पिता को वंचित नहीं किया जाना चाहिए और जोड़ों के पास भी यह विकल्प होना चाहिए कि वे किसी ऐसी महिला को सेरोगेट मां के तौर पर चुन सकें, जो उनकी करीबी रिश्तेदार नहीं है।

हालांकि वरिष्ठ वकील शेखर नफाडे इस पूरे मुद्दे पर एक अलग और मिला-जुला रूख रखते हैं। उन्होंने यह बात मानी कि चर्चित हस्तियों में एकल माता-पिता बनने का एक ‘चलन’ हो गया है। हालांकि उन्होंने इस बात की वकालत की कि दंपति की करीबी महिला को ही सेरोगेट मां बनने की अनुमति देने वाला प्रावधान हटाया जाना चाहिए।

सेरोगेसी :नियमन: विधेयक, 2016 पिछले साल लोकसभा में लाया गया था। इस विधेयक को पारिवारिक कानूनों के मामलों को देखने वाले अनिल मल्होत्रा और प्रिया हिंगोरानी जैसे वकीलों की ओर से आलोचना का सामना करना पड़ा। इन्होंने समलैंगिकों से माता-पिता बनने का सुख छीन लेने वाले प्रावधानों पर हमला बोला। इस विधेयक का एक प्रावधान कहता है कि केवल कानूनी तौर पर शादीशुदा लोग ही सेरोगेसी का लाभ ले सकते हैं।

प्रस्तावित नियम अविवाहित दंपति, एकल माता-पिता, लिव-इन साथियों और समलैंगिकों को सेरोगेसी के जरिए बच्चे पैदा करने से रोकता है। एक बड़े निजी अस्पताल के प्रमुख चिकित्सा अधिकारी डॉ बिकास कुमार सिंह ने एकल माता-पिता के मुद्दे पर कोई टिप्पणी नहीं की लेकिन उस प्रावधान पर चिंता जाहिर की, जो किसी करीबी रिश्तेदार को ही सेरोगेट मां बनाने की अनिवार्यता रखता है।

सिंह ने कहा, ‘‘संतानहीन दंपति के लिए आखिरी उम्मीद को खत्म नहीं करना चाहिए, बल्कि उचित बदलावों के साथ इसे विस्तार दिया जाना चाहिए।’’ हिंगोरानी ने कहा कि सिर्फ करीबी महिला रिश्तेदार को ही सेरोगेट मां बनने की अनुमति देना सही नहीं है क्योंकि उसकी गोपनीयता बनाकर रखी जानी चाहिए और किसी भी अन्य महिला को इसकी अनुमति होनी चाहिए।

मल्होत्रा ने कहा कि अविवाहित दंपतियों और अन्य को सेरोगेसी का लाभ लेने से प्रतिबंधित किया जाना संविधान के अनुच्छे 14 का उल्लंघन है। यह अनुच्छेद कानून के समक्ष समानता एवं समान सुरक्षा का अधिकार देता है।

विधेयक के अनुसार, सेरोगेसी का लाभ लेने की इच्छा रखने वाले दंपति को कम से कम पांच साल तक विवाहित होना चाहिए, उन्हें भारतीय नागरिक होना चाहिए और सेरोगेसी की अनुमति सिर्फ परोपकार की भावना के चलते ही मिल सकती है। यह विधेयक संतान पैदा करने में अक्षम दंपति के लिए उम्रसीमा भी तय करता है। इसके अनुसार, महिला की उम्र 23-50 साल होनी चाहिए और पुरूष की उम्र 26-55 साल होनी चाहिए।

सेरोगेसी के व्यवसायीकरण का विरोध करते हुए उच्चतम न्यायालय में याचिका डालने वाले नाफाडे ने कहा कि वह एकल माता-पिता के सिद्धांत को मान्यता नहीं देते और इस बात के लिए एक तय अवधि होनी चाहिए, जिसमें कोई विवाहित दंपति सेरोगेसी ले सकता है।

उन्होंने कहा, ‘‘यह एक अप्राकृतिक प्रक्रिया के जरिए बच्चा पैदा करने का विकल्प नहीं बनना चाहिए। बच्चे के पास माता और पिता दोनों होने चाहिए। समाज में निकलने पर यदि उसके पास माता या पिता नहीं हैं तो उसे समस्या होगी। यह बच्चे के हित में है।’’ हालांकि विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि करीबी रिश्तेदार को ही सेरोगेट मां बनाने का प्रावधान विरोध योग्य है।