देश का शराब मुक्त होना ज़रूरी या ‘कबाब’ मुक्त?

पिछले कुछ दिनों से भारतीय मीडिया द्वारा पूरे देश का ध्यान देश में निरंतर बढ़ती जा रही मंहगाई,बेरोज़गारी आदि से हटाकर शराब और ‘कबाब’ की ओर खींचा जा रहा है। देश के कई राज्यों की सरकारें गौकशी रोकने के नाम पर जहां अवैध बताकर अनेक बूचडख़ाने बंद कर यह जताने पर लगी हैं कि वे मांसाहार खासतौर पर गौहत्या व गौवंश तस्करी आदि की प्रबल विरोधी हैं वहीं कई राज्यों में आम लोग खासतौर पर महिलाएं शराब की बिक्री तथा शराब सेवन के विरोध में न केवल सडक़ों पर संगठित होकर उतरती दिखाई दे रही हैं बल्कि उनकी आक्रामकता से यह भी साफ ज़ाहिर हो रहा है कि वास्तव में शराब ने उन्हें व उनके परिवार को किस कद्र नुकसान पहुंचाया है। मांसाहार का विरोध एक भावनात्मक विषय तो ज़रूर हो सकता है परंतु मांसाहार की लत या इसे अपनाने का शौक निश्चित रूप से कोई ऐसा व्यसन नहीं है जिससे किसी का घर-परिवार उजड़े या इसका सेवन करने वाले के स्वास्थय पर इसका कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ सके। इसके बावजूद देश के अधिकांश राज्यों में चोरी-छुपे बिकने वाली अवैध शराब को रोकने में तत्परता दिखाने के बजाए कुछ राज्य सरकारों द्वारा अवैध बूचडख़ानों के नाम पर मांसाहार पर पाबंदी लगाने की कोशिशें की जा रही हैं। ऐसे में यह सवाल ज़रूरी हो गया है कि आिखर सरकार की प्राथमिकता जनहित के मद्देनज़र क्या होनी चाहिए, शराबबंदी या ‘कबाब’ बंदी?

निर्मल रानी

इस समय हमारे देश में गुजरात,केरल,बिहार,नागालैंड व मणिपुर जैसे राज्यों में तथा केंद्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप में शराब बंदी का कानून लागू है। इसके पूर्व आंध्रप्रदेश,हरियाणा,मिज़ोरम, तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी शराबबंदी लागू की गई थी। परंतु बाद में किन्हीं कारणों से या शराब उत्पादन कर्ताओं के दबाव में आकर इसे हटा लिया गया। शराब बिक्री को लेकर पिछले दिनों एक आश्चर्यजनक फैसला तो छत्तीसगढ़ की रमनसिंह सरकार द्वारा उस समय लिया गया जबकि  सरकार ने शराब की बिक्री राज्य सरकार द्वारा ही करने की घोषणा की। गत् एक अप्रैल से राज्य में शराब के ठेकों की नीलामी की व्यवस्था समाप्त हो चुकी है तथा राज्य सरकार स्वयं शराब बेच रही है। परंतु शराब के दुष्प्रभाव का सामना करने वाले लाखों परिवारों की महिलाओं व बच्चों को सरकार की शराब बिक्री की नीति कतई नहीं भा रही है। समाचारों के अनुसार लगभग पूरे छत्तीसगढ़ राज्य में पहली अप्रैल को ही शराब बिक्री की नई सरकारी नीति के विरोध में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किए गए। राज्य की महिलाओं ने मुख्यमंत्री रमनसिंह तथा मंत्रिमंडल के दूसरे मंत्रियों की पत्नियों के नाम एक पत्र जारी किया जिसकी तहरीर इस प्रकार है-‘आदरणीय दीदी,आप अपने पतिदेव को समझाएं,इस बुरे काम से रोकें,आपके पतिदेव पूर्ण शराबबंदी के बजाए प्रदेश में 712 शराब की दुकानें और 413 मदिरापान गृह खोल रहे हैं। नवरात्रि के पावन पर्व पर भाईयों का बहनों के लिए आिखर यह कैसा तोहफा है? और यदि हम इसका विरोध करते हैं तो इसे अपराधिक प्रकरण का दर्जा दिया जाता है। क्या यही दिन देखने के लिए हमने भाजपा को तीसरी बार सरकार बनाने का मौका दिया था’? गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में सरकार की शराब की बिक्री के विरोध में केवल विपक्षी पार्टियां ही नहीं बल्कि भाजपा की कई महिला नेत्रियां भी इन विरोध प्रदर्शनों में शामिल हुई हैं।

शराबबंदी को लेकर गत् दिनों नवरात्रों के दौरान ही राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं का गुस्सा इस कद्र फूटा जिसे देखकर पूरा देश हैरान रह गया। खासतौर पर यह देखकर कि आिखर असंगठित असहाय व कमज़ोर होने के बावजूद बंगाल,छत्तीसगढ़,मध्यप्रदेश,उत्तरप्रदेश, राजस्थान,हरियाणा तथा उत्तराखंड जैसे राज्यों में शराब से पीडि़त महिलाएं किस स्तर पर शराब के विरोध में अपने हाथों में डंडे व लाठियां लेकर सडक़ों पर उतरीं,अनेक स्थानों पर शराब के ठेकों में तोड़ फोड़ की तथा कई स्थानों पर शराब की दुकानों पर आग लगा दी तथा कई जगह यातायात ठप्प कर दिया। कई स्थानों पर धरने दिए गए व प्रदर्शन किए गए। मीडिया से बातें करते समय इन महिलाओं के चेहरों से इनका व इनके बच्चों का दु:ख-दर्द साफ ज़ाहिर हो रहा था। कोई धनपति या संपन्न व्यक्ति जो दिनभर में हज़ारों या लाखें रुपये कमाता हो और रोज़ शाम को दो-चार हज़ार रुपये शराब में फूंक कर घर आए तो उसके व उसके परिवार पर निश्चित रूप से कोई विपरीत प्रभाव नहीं पडऩे वाला। परंतु जिस परिवार का मुखिया सौ-दौ सौ रुपये की कमाई करता हो और अपनी गरीबी व तंगहाली के चलते मानसिक उत्पीडऩ झेल रहा हो और वही व्यक्ति ऐसी मनोदशा से मुक्ति पाने के बहाने शराब का आदी हो जाए। ऐसे परिवार की महिलाओं व बच्चों पर क्या गुज़रती होगी इसका दर्द केवल वही महिलाएं जान सकती हैं जो इन हालात की भुक्तभोगी हैं। परंतु शराब की सरकारी        ठेकों से बिक्री कराने के पक्षधर राजनेता वोट बैंक साधने की खातिर भावनात्मक राजनैतिक कार्ड खेलते हुए गौहत्या करने वाले को तो फांसी पर लटकाने की बात बड़े ही चेतावनी भरे अंदाज़ में करते हैं परंतु शराब सेवन के चलते जो महिलाएं बहनें व बच्चे स्वयं परिस्थितिवश फांसी पर चढऩे की स्थिति में पहुंच चुके हैं उनकी चिंता करने की ज़रूरत महसूस नहीं करते।

देश का दूसरा सबसे बड़ा राज्य बिहार इस समय शराबबंदी को लेकर पूरे देश के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत करने की स्थिति में पहुंच चुका है। गत् वर्ष 21 जनवरी को नितीश सरकार ने शराबबंदी के समर्थन में लगभग 12 हज़ार किलोमीटर की विश्व कीर्तिमान स्थापित करने वाली एक अद्भुत मानव श्रृंखला बनाई। इस मानव श्रृंखला की सबसे बड़ी विशेषता इसकी लंबाई नहीं बल्कि शराब के विरोध में एक-दूसरे का हाथ थामे हर आयु-वर्ग के सभी धर्मों व जातियों के तथा सभी प्रकार की आर्थिक हैसियत रखने वाले वह लोग शामिल थे जो वास्तव में भारतीय समाज का दर्पण कहे जाते हैं। जात-पात,धर्म-संप्रदाय व गरीबी-अमीरी जैसी सीमाओं के बिना बनाई गई यह मानव श्रंृखला शराब बंदी के पक्ष में थी जिसका पूरे राज्य के लोगों ने स्वागत किया था। ज़ाहिर है आज देश की कुछ राज्य सरकारें बूचडख़ाने को लेकर जो भावनात्मक कार्ड खेल रही हैं उन्हें आम जनता का कोई समर्थन प्राप्त नहीं है सिवाए इसके कि वे इसे जबरन धर्म व संप्रदाय के आधार पर जनता पर थोपने की कोशिश में लगी हैं। लिहाज़ा शराबबंदी की नीति को लेकर एक राष्ट्रीय स्तर की समीक्षा बैठक बुलानी चाहिए जिसमें सभी राज्यों के मुख्यमंत्री शरीक हों। और पूरी ईमानदारी के साथ वे इस विषय पर गंभीर चिंतन करें कि शराब की बिक्री से मिलने वाला राजस्व सरकारों के लिए ज़्यादा कीमती है या शराब के सेवन से देश की जनता का व करोड़ों परिवारों का होने वाला नुकसान ज़्यादा अहमियत रखता है? शराब के सेवन से केवल लोगों का घर ही नहीं उजड़ता बल्कि शराब देश में होने वाले तमाम िकस्म के अपराधों व दुर्घटनाओं की भी वजह बनती है। लिहाज़ा लोकहित का ढिंढोरा पीटने वाली तथा जनता के दु:ख-दर्द का निवारण करने का दावा करने वाले राजनेताओं को चाहिए कि वे शराब उत्पादन व इसकी बिक्री में लगे उद्योगपतियों के हितों की चिंता करने के बजाए देश के उन करोड़ों लोगों के परिवारों की िफक्र करें जिनके घर शराब से बरबाद होने की कगार पर हैं। और यह भी बड़ी ईमानदारी से सोचें कि देश का शराब मुक्त होना ज़्यादा ज़रूरी है या ‘कबाब’ मुक्त होना?