खबर के हर पहलू की तहकीकात पत्रकार करें – श्री गणेश साकल्ले

शहर में बुधवार को संभागीय जनसम्पर्क कार्यालय द्वारा मीडिया संवाद कार्यशाला 02 सत्रों में आयोजित की गई। कार्यक्रम में अतिथि के रूप में वरिष्ठ पत्रकार श्री गणेश साकल्ले, श्री आनन्द पाण्डेय और नदी संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाने वाले श्री सुनील चतुर्वेदी शामिल हुए। शहर के इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया के पत्रकारों ने मीडिया संवाद कार्यशाला में भागीदारी की। सर्वप्रथम कार्यक्रम का शुभारम्भ अतिथियों द्वारा मां सरस्वती के चित्र के समक्ष माल्यार्पण और दीप प्रज्वलित कर किया गया। कार्यक्रम की रूपरेखा उप संचालक संभागीय जनसम्पर्क कार्यालय श्री पंकज मित्तल द्वारा बताई गई।
मीडिया संवाद के प्रारम्भ में पत्रकारिता से जुड़े सम-सामयिक विषयों पर विशिष्ट अतिथियों और मीडियाकर्मियों के बीच विचारों का आदान-प्रदान हुआ। डीबी स्टार भोपाल के सम्पादक व विषय विशेषज्ञ श्री गणेश साकल्ले ने पत्रकारिता से जुड़े विभिन्न विषयों पर जानकारी दी। उन्होंने कहा कि प्रिंट मीडिया का भविष्य काफी उज्जवल है। समय के साथ अखबारों को अपनी भूमिका में बदलाव लाना होगा। आजकल न्यूज चैनल्स के समाचार देखकर अखबारों के ‘लीड टाइटल’ बनाये जाते हैं, इससे बचना चाहिये। समाचारों की पैकेजिंग काफी अच्छी होनी चाहिये। किसी भी खबर से जुड़े हुए अन्य पहलुओं की भी पूरी तहकीकात संवाददाताओं को करना चाहिये। अन्तर्राष्ट्रीय व राष्ट्रीय स्तर की खबरों के साथ-साथ स्थानीय खबरों को भी प्रमुखता से प्रकाशित करना चाहिये।
इसके पश्चात वरिष्ठ पत्रकार श्री आनन्द पाण्डेय ने अपने विचार सबके समक्ष व्यक्त किये। उल्लेखनीय है कि श्री पाण्डेय वर्तमान में नईदुनिया में ग्रुप एडिटर हैं। उन्होंने प्रिंट मीडिया के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और रेडियो में भी कार्य किया है। इसके अलावा आध्यात्मिक कम्युनिकेशन में भी उन्होंने डिप्लोमा किया है। श्री पाण्डेय ने कहा कि समय के साथ-साथ पत्रकारिता में भी काफी बदलाव आए हैं। पत्रकारिता के स्तर में भी काफी गिरावट आई है। आजकल व्याकरण और भाषा में भी काफी त्रुटियां हो रही हैं, इसमें सुधार की आवश्यकता है। हमें किसी भी चीज को समग्र रूप से देखने की आदत विकसित करना होगी। पत्रकार भी समाज का एक हिस्सा होते हैं, इसलिये उन पर भी सामाजिक गतिविधियों का असर पड़ता है।
आजकल सोशल मीडिया का चलन है। ऐसे समय में केवल वे ही पत्रकार सफल होंगे, जो ‘आईसीएस’ का सूत्र अपने पर लागू करें। ‘आई’ अर्थात ‘आइडिया’, ‘सी’ अर्थात ‘क्रेडिबिलिटी’ और ‘एस’ अर्थात ‘स्पीड’। सोशल मीडिया स्पीड के मामले में काफी आगे है, लेकिन क्रेडिबिलिटी अर्थात विश्वसनीयता के पैमाने पर सोशल मीडिया असफल है। आप आंख बन्द करके सोशल मीडिया के समाचारों पर विश्वास नहीं कर सकते। प्रिंट मीडिया गति के मामले में भले ही सोशल मीडिया से पीछे हो, लेकिन विश्वसनीयता के मामले में शत-प्रतिशत खरा उतरता है।
मीडिया संवाद में इसके पश्चात नदी संरक्षण पर विचार-विमर्श किया गया। नदी संरक्षण के विशेषज्ञ श्री सुनील चतुर्वेदी ने कहा कि नदी को निरन्तर प्रवहमान बनाये रखने के लिये हमें उसे एक जीवित प्राणी के रूप में स्वीकारना होगा। किसी भी नदी को जीवित रखने के लिये धर्म के साथ-साथ विज्ञान की भी आवश्यकता है। धर्म के मूल में विज्ञान ही है। पिछले 30 सालों में नदियों की स्थिति बेहद चिन्ताजनक हो गई है। इसके सुधार के लिये कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है। उन्होंने नदी का अर्थ प्रतिपादित करते हुए कहा कि 02 किनारों के बीच बहने वाली जलधारा को हम नदी मानते हैं, लेकिन नदी का वास्तविक शुभारम्भ वहां होता है जहां बारिश की पहली बूंद लुढ़ककर आती है।
शिप्रा और नर्मदा अत्यन्त पुरातन नदियां हैं। पृथ्वी में होने वाले बदलाव के साथ-साथ नदियों में भी अनेक बदलाव होते हैं। नदियों की भी मनुष्यों की तरह अनेक अवस्थाएं होती हैं। जहां से नदी का उद्गम होता है, वहां वह बाल्य अवस्था में होती हुई प्रतीत होती है। उसके पश्चात तरूणावस्था और सागर में मिलने से पूर्व वृद्धावस्था में प्रतीत होती है। नदियों के निरन्तर सूखने के पीछे बहुत सारे कारण हैं। पिछले 30 सालों में जिन 02 प्रमुख कारणों ने नदियों को बहुत नुकसान पहुंचाया है, उनमें नदी किनारे लगने वाले उद्योग और बढ़ती हुई जनसंख्या प्रमुख हैं। उद्योगों से निकलने वाले अवशिष्ट सीधे नदी में मिल जाते हैं, जिससे उनमें जल प्रदूषण का स्तर बहुत बढ़ जाता है।
श्री चतुर्वेदी ने बताया कि वर्तमान में कई नदियों का पानी आचमन करने लायक भी नहीं है। हर साल पूरे देश में 32 अरब लीटर म्युनिसिपल अवशिष्ट नदियों में जा मिलता है। हमें नदी की स्थिति को सुधारने के लिये पहले नदियों को समझना होगा। नदी को समझने से पहले हमें नदी के तंत्र को समझना होगा। नदी में रहने वाले प्राणी भी उसी का हिस्सा हैं। बढ़ते हुए प्रदूषण से जल में रहने वाले प्राणी और वनस्पतियों की संख्या में भी काफी कमी आई है। धार्मिक कर्मकांडों के चलते भी नदियों का प्रदूषण बहुत बढ़ा है। इसके अलावा अवैध खनन से भी नदियों के जल स्तर में गिरावट देखने में आई है।
अवैध खनन से नदी की गति भी प्रभावित होती है। नदी की तलहटी में रेत का होना अतिआवश्यक है। उसी से जल स्तर एकसमान बना रहता है। बड़े-बड़े बांध बनाने से भी नदियों को खतरा होता है। इसके उपाय के तहत हमें ‘कैचमेंट एरिया ट्रीटमेंट’ करने की आवश्यकता है। अर्थात जहां पहली बूंद पानी की नदी में मिलती है, वहीं से हमें उसका उपचार करना होगा। बेहतर सीवेज सिस्टम बनाने होंगे। किसी भी तरह का पानी बिना उपचार के नदी में नहीं छोड़ा जाये, ऐसे प्रयास करने होंगे। अवैध खनन को सख्ती से रोकने के लिये कदम उठाने होंगे। इसके लिये कई कानून बनाये गये हैं, लेकिन उन्हें सख्ती से लागू करने की आवश्यकता है। रेत खनन की एक निश्चित सीमा निर्धारित करनी चाहिये।
श्री चतुर्वेदी ने कहा कि किसी भी चीज के संरक्षण के लिये एक वातावरण का निर्माण होना बेहद जरूरी है। वर्तमान में जो नर्मदा सेवा यात्रा प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा संचालित की जा रही है, उस यात्रा में आमजन में बहुत उत्साह देखने को मिला है। नदी या पर्यावरण का संरक्षण केवल सरकार की ही जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज के हर वर्ग को इसमें अपनी सक्रिय भूमिका निभानी होगी। इस दिशा में मीडिया की भी बहुत बड़ी जवाबदारी बनती है। जन-जागरूकता लाने के लिये मीडिया एक बहुत अहम किरदार निभा सकती है। इसके तहत नदी संरक्षण से जुड़े विभिन्न पहलुओं और वैज्ञानिक तथ्यों को समय-समय पर अखबारों में प्रमुखता के साथ प्रकाशित करना चाहिये। नदी संरक्षण के लिये सशक्त नीति बनना जरूरी है।
नदी के प्रदूषण को रोकने के लिये खेतों में उपयोग किये जाने वाले रासायनिक खादों का प्रयोग भी बन्द करना चाहिये। नदियों के संरक्षण के लिये एक अलग से अधिनियम भी बनाया जाना चाहिये।
कार्यशाला के दूसरे सत्र में श्री आनन्द पाण्डेय ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ईश्वर ने हमारी सभी प्राथमिक जरूरतों को सही अनुपात में हमारे लिये उपलब्ध करवाया है, लेकिन मनुष्य ने ईश्वर द्वारा प्रदत्त 03 प्रमुख आवश्यकताओं हवा, जल और अनाज का हमेशा दुरूपयोग किया। वायु, जल व पर्यावरण प्रदूषण के लिये हम सभी जिम्मेदार हैं, इसीलिये शासन के साथ-साथ आमजन की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि पर्यावरण के संरक्षण में सहयोग करें। कानूनी, सामाजिक, धार्मिक और वैज्ञानिक तरीकों से हमें जल संरक्षण की ओर ध्यान केन्द्रित करना होगा। पूजन सामग्री के विसर्जन के लिये अलग से व्यवस्थाएं करनी होंगी। उन्होंने कहा कि कुप्रथाओं को बन्द करने में काफी समय लग जाता है, इसीलिये पर्यावरण और नदी संरक्षण के लिये स्कूल लेवल पर ही बच्चों को शिक्षित करना होगा। हमें अपने बच्चों की मानसिकता को बदलना होगा। उनके मन में नदी संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण के प्रति भावनाएं उत्पन्न करनी होंगी।
मीडिया संवाद कार्यशाला में स्थानीय पत्रकारों ने भी अपने सुझाव सभी के समक्ष रखे और विचारों का आदान-प्रदान किया। पत्रकार श्री कीर्ति राणा ने कहा कि स्कूली पाठ्यक्रम में क्षेत्रीय नदियों का भी वर्णन किया जाना चाहिये। शादी-ब्याह में दम्पत्तियों को पर्यावरण संरक्षण की भी शपथ दिलवानी चाहिये। वैदिक कर्मकाण्ड के अन्तर्गत पूजन सामग्री का विसर्जन नदी में करने पर रोक लगाई जानी चाहिये। न्यायालयों में गीता के साथ-साथ नदियों की भी शपथ साक्षियों को दिलवाई जानी चाहिये।
पत्रकार श्री नरेन्द्र कुमार चौकसे ने कहा कि ऐसे उद्योग, जहां उनके अवशिष्ट का निष्पादन सही तरीके से नहीं किया जाता है और जो वायु और जल प्रदूषण को बढ़ावा देते हैं, उनकी रिपोर्टिंग पत्रकारों द्वारा की जानी चाहिये, ताकि उनके खिलाफ उचित कार्यवाही शासन द्वारा की जा सके। उद्योगों एफ्लुएन्ट ट्रीटमेंट प्लांट (ईटीपी) अर्थात दूषित जल शोधन संयंत्र लगाये जाने चाहिये। पत्रकार श्री वरूण श्रीमाल ने कहा कि नदी संरक्षण के तहत शिप्रा एक्शन प्लान बनाया जाना चाहिये। पत्रकार श्री सुनील चतुर्वेदी ने कहा कि हमें नई पीढ़ी को नदी व पर्यावरण संरक्षण के उपायों के बारे में बताना चाहिये और जन-जागरूकता के लिये अभियान चलाया जाना चाहिये। कार्यशाला के अन्त में उप संचालक श्री पंकज मित्तल ने कहा कि संवाद का विधिवत दस्तावेजीकरण किया जायेगा और शासन को नदी संरक्षण पर दिये गये पत्रकारों के महत्वपूर्ण सुझावों के प्रस्ताव भेजे जायेंगे। इसके पश्चात अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट किये गये। मीडिया संवाद कार्यशाला के अन्त में आभार उप संचालक द्वारा व्यक्त किया गया।
विकास के लिये रेती भी चाहिये और नदी भी बचाना है

मीडिया संवाद में भोपाल के दैनिक भास्कर के वरिष्ठ पत्रकार श्री गणेश साकल्ले ने कहा कि मानव सभ्यता का विकास भी आवश्यक है और हमारे प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना भी आवश्यक है। विकास के लिये रेती भी चाहिये और नदियों को बचाना भी जरूरी है। नीति, नियम और कानून बनाने से काम नहीं होगा। सामाजिक सहभागिता से ही नदियों को बचाया जा सकता है। श्री साकल्ले ने कहा कि नदी संरक्षण के लिये राज्य शासन की स्पष्ट नीति होना चाहिये। इसके लिये निगम या बोर्ड बनाया जा सकता है। इसी के साथ अवैध खनन पर मौजूदा कानून के तहत कड़ी पाबन्दी लगाना चाहिये।
नईदुनिया इन्दौर के वरिष्ठ सम्पादक श्री आनन्द पाण्डे ने कहा कि नदी संरक्षण सरकार का काम न होकर आमजन की समस्या होना चाहिये। उन्होंने कहा कि इन्सान की प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहा है। प्राकृतिक आपदाओं से वह न तो सबक ले रहा है ना ही समझ ही रहा है। नदी संरक्षण के लिये कानूनी, सामाजिक, धार्मिक व वैज्ञानिक रूप से समन्वय कर प्रयास करना होगा, तभी इस समस्या का समाधान होगा। श्री पाण्डे ने कहा कि प्रकृति की पूजा हमारे यहां वैदिक काल से है। वर्तमान में भी मुद्दों को भावनाओं से जोड़ना एक सार्थक पहल होगी। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को नदियों से प्रेम करना स्कूल स्तर से ही सिखाना होगा। नदी संरक्षण को जन-आन्दोलन बनाकर जो जहां है, उसे उसी स्तर पर काम करना होगा।
वरिष्ठ पर्यावरणविद एवं नदी संरक्षण आन्दोलन से जुड़े श्री सुनील चतुर्वेदी ने कहा कि सरकार के भरोसे न रहकर हमें अपने स्तर पर काम करना चाहिये। उन्होंने बच्चों को नदी के बारे में शिक्षण देने के क्षेत्र में काम करने की आवश्यकता पर बल दिया।

प्रतिभागी पत्रकारों ने उपयोगी सुझाव दिये

मीडिया संवाद के अन्तिम सत्र में मौजूद पत्रकारों द्वारा उपयोगी सुझाव दिये गये। पत्रकार श्री कीर्ति राणा ने कहा कि स्कूल पाठ्यक्रम में क्षेत्रीय नदियों का विशेष महत्व दिया जाये। डॉ.नरेन्द्र चौकसे ने कहा कि जितने भी उद्योग नदी किनारे लगे हैं, उन पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की नजर रहना चाहिये। डॉ.सचिन गोयल ने कहा कि शिप्रा नदी में प्रदूषण शिप्रा किनारे नवनिर्मित होटल्स एवं मैरिज गार्डन्स कर रहे हैं। पत्रकार श्री वरूण श्रीमाल ने कहा कि मीडिया संवाद के निष्कर्षों को ‘शिप्रा एक्शन प्लान’ के नाम से प्रकाशित किया जाना चाहिये। पानी की प्राथमिकता तय होना चाहिये। पत्रकार श्री राजेश जोशी ने प्राथमिक स्तर पर नदी संरक्षण का पाठ पाठ्यक्रम में रखने की आवश्यकता पर बल दिया।

पत्रकार श्री ब्रजेश परमार ने शासन स्तर से नदियों पर नीति एवं नियम बनाने की बात कही। श्री द्वारकाधीश चौधरी ने कहा कि नदी के दोनों तटों पर 200-200 मीटर के दायरे में कोई भी निर्माण कार्य नहीं होना चाहिये। पत्रकार श्री महेन्द्रसिंह बैस ने सुझाव दिया कि मीडिया संवाद में निकले निष्कर्ष राज्य शासन के वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचना चाहिये। मीडिया संवाद कार्यक्रम का संचालन उप संचालक जनसम्पर्क श्री पंकज मित्तल ने किया।

मीडिया संवाद के निष्कर्ष
  • नदी संरक्षण के लिये शासन की ओर से सशक्त एवं स्पष्ट नीति बनाई जानी चाहिए तथा इसका समुचित क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
  • नदी संरक्षण के लिए शासन द्वारा एक पृथक संस्था, बोर्ड आदि बनाया जाना चाहिए, जिसमें विषय विशेषज्ञों को शामिल किया जाना चाहिए।
  • नदी से अवैध रूप से रेत आदि के खनन एवं परिवहन पर सख्ती से रोक लगाई जानी चाहिए।
  • नदी संरक्षण के लिए समाज को जागृत किया जाना चाहिए तथा नदियों में पूजन सामग्री आदि का डाले जाना पूर्ण रूप से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।
  • नदी संरक्षण के लिए सरकार को कई मोर्चों पर काम करना चाहिए।
  • नदी संरक्षण के लिए नदी के उद्गम स्थल से ही जल संग्रहण क्षेत्र संस्करण (कैचमेंट एरिया ट्रीटमेंट) किया जाना चाहिए। बांस का रोपण इसमें प्रभावी सिद्ध होगा।
  • नदी के किनारे बसे गांवों का विकास नदी संरक्षण के अनुरूप किया जाना चाहिए।
  • हर गांव/शहर से निकलने वाले दूषित जल को स्वच्छ करने के बाद ही नदी में छोड़ा जाना चाहिए।
  • रासायनिक खाद का इस्तेमाल रोका जाना चाहिए, क्योंकि यह नदी के जल को प्रदूषित करने का बहुत बड़ा कारक है।
  • नदी में जलजीव अधिक से अधिक संख्या में होने चाहिएं। नदी में मगरमच्छ छोड़े जाने चाहिएं, जिससे लोग अवैध खनन करने में डरें।
  • नदी अपने दोनों ओर जब-जब जितनी-जितनी दूरी तक गई हो, उस समूचे क्षेत्र को नदी का क्षेत्र मानते हुए वहां किसी भी प्रकार का निर्माण नहीं होना चाहिए।
  • नदी के किनारे औद्योगिकरण तथा शहरीकरण को रोका जाना चाहिए।
  • नदी पर पहले पूरा अध्ययन होना चाहिए, उसके पश्चात उसके संरक्षण के सम्बन्ध में नीति बनाई जानी चाहिए।
  • नदी का संरक्षण केवल सरकार का मुद्दा न होकर समाज की प्राथमिकता होना चाहिये।
  • नदी संरक्षण को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए तथा प्राथमिक विद्यालय स्तर से ही इसकी शिक्षा बच्चों को दी जानी चाहिए। स्कूली पाठ्यक्रम में क्षेत्रीय नदी के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए।
  • अदालतों में गीता के साथ ही पवित्र नदियों की शपथ भी दिलाई जानी चाहिए।
  • नर्मदा-सेवा यात्रा जैसी यात्राएं प्रत्येक नदी के आसपास आयोजित की जानी चाहिए।
  • उद्योगों के साथ ही हर होटल के लिए दूषित जल संस्करण संयंत्र (एफ्लूएंट ट्रीटमेंट प्लांट) लगाया जाना कानूनी रूप से आवश्यक है, अत: इसे सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
  • शिप्रा नदी के संरक्षण के लिए भी एक ‘शिप्रा एक्शन प्लान’ बनाया जाकर इस पर योजनाबद्ध तरीके से कार्य होना चाहिए।
  • जिले के नागदा शहर में औद्योगिक प्रदूषण रोकने के लिए प्रभावी कार्यवाही की जानी चाहिए।
  • नदी संरक्षण के लिए हम सभी को अपनी-अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाना चाहिए।

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