शराब: प्रतिबंध ज़रूरी या शासकीय संरक्षण ?

शराब एक ऐसा नशीला पेय पदार्थ है जिसकी संभवत: कोई भी व्यक्ति यहां तक कि इसका सेवन करने वाले लोग भी इसके गुण,लाभ या विशेषताएं बयान नहीं कर पाते। हमारे देश में ऐसे लाखों परिवार मिल जाएंगे जो शराब की वजह से बरबाद हो चुके हैं। इस नामुराद नशीले द्रव्य ने न जाने कितने घरों को तबाह कर दिया,कितने परिवारों को तोड़ दिया, इसके चलते अनगिनत हत्याएं तथा दूसरे कई गंभीर अपराध होते रहे हैं। वाहन दुर्घटनाओं में भी शराब सेवन की अहम भूमिका मानी जाती है। इन सबके अतिरिक्त व्यक्तिगत् रूप से शराब पीने वाले व्यक्ति के स्वास्थय पर इसका जो बुरा प्रभाव पड़ता है वह जगज़ाहिर है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि शराब किसी भी दृष्टिकोण से जब परिवार या समाज के लिए पूरी तरह से हानिकारक है तो निश्चित रूप से यह द्रव्य देश के विकास के लिए भी बहुत बड़ी बाधा है। आज शराब की बिक्री वाले कई राज्य ऐसे भी हैं जहां अपने अभिभावकों को शराब के नशे में हर वक्त डूबा देखकर स्कूल जाने वाले उनके छोटे-छोटे बच्चे भी शराब की लत का शिकार हो चुके हैं। ऐसे में निश्चित रूप से एक ऐसी राष्ट्रीय नीति की दरकार है जो समाज को इस नासूर जैसी बुराई से बचाने तथा देश को विकास के रास्ते पर ले जाने हेतु बनाई जाए। ज़ाहिर है राष्ट्रीय स्तर पर इसे प्रतिबंधित करना ही भारतीय समाज को इस बुराई से दूर रखने का एकमात्र उपाय है।

निर्मल रानी

हमारे देश के संविधान में राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत अनुच्छेद 47 के अनुसार राज्य नशीली दवाओं के औषधीय उद्देश्यों को छोडक़र इसके उपभोग के निषेध को लाने का प्रयास करेगा जोकि स्वास्थय के लिए हानिकारक है। इसी नीति के अंतर्गत् भारत में गुजरात,केरल,नागालैंड,मणिपुर,संघ शासित प्रदेश लक्षद्वीप तथा अब बिहार में भी शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है। इसके पूर्व आंध्र प्रदेश,हरियाणा,मिज़ोरम और तमिलनाडु में भी शराब को प्रतिबंधित किया गया था परंतु बाद में यह प्रतिबंध हटा लिए गए। शराब पर ताज़ातरीन बहुचर्चित प्रतिबंध की घोषणा 26 नवंबर 2015 को बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार द्वारा की गई। हालांकि उन्होंने 1 अप्रैल 2016 से राज्य में प्रतिबंध लगाने की घोषणा की थी। परंतु 5 अप्रैल 2016 से पूरे राज्य में पूर्ण शराबबंदी घोषित कर दी गई। यहां तक कि राज्य के किसी भी होटल व क्लब तक में इसका सेवन नहीं किया जा सकता। इस कानून की अवहेलना करने वालों को पांच से लेकर दस वर्ष तक का कारावास व जुर्माना हो सकता है। हालांकि 30 सिंतबर 2016 को बिहार हाईकोर्ट ने शराबबंदी के विरुद्ध अपना फैसला सुनाते हुए शराब प्रतिबंध को अवैध,अव्यहवारिक तथा असंवैधानिक बताया था। परंतु देश के सर्वाेच्च न्यायालय ने उच्च न्यायलय के आदेश पर रोक लगा दी। बहरहाल बिहार में इस समय पूर्ण शराब बंदी सख्ती से लागू हो चुकी है और पूरे राज्य का जनसमर्थन नितीश कुमार को इस मुद्दे पर हासिल है। यहां तक कि 21 जनवरी 2017 को मुख्यमंत्री नितीश कुमार के आह्वान पर शराब प्रतिबंध के समर्थन में राज्य में बारह हज़ार सात सौ साठ किलोमीटर की एक ऐतिहासिक मानव श्रृंखला बनाई गई जिसमें राज्य के तीन करोड़ से अधिक लोगों ने एक-दूसरे का हाथ पकडक़र शराबबंदी के समर्थन में अपनी एकजुृटता का इज़हार किया।

सवाल यह है कि जब बिहार में लागू की गई शराबबंदी को केवल बिहार राज्य के लोगों का ही नहीं बल्कि पूरे देश का समर्थन हासिल है यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सार्वजनिक रूप से राज्य में शराबबंदी लागू करने के लिए मुख्यमंत्री नितीश कुमार की प्रशंसा कर चुके हैं ऐसे में भारतीय जनता पार्टी के शासन वाले राज्य छत्तीसगढ़ में सरकार द्वारा स्वयं शराब बेचने की व्यवस्था करने का आिखर क्या औचित्य है? वैसे भी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा० रमन सिंह एक अध्यापक होने के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की गहन शिक्षा भी हासिल कर चुके हैं। ऐसे में कम से कम उनके मुख्यमंत्री रहते यह उम्मीद तो नहीं की जा सकती थी कि राज्य में शराब बेचने की जि़म्मेदारी राज्य सरकार स्वयं उठाएगी? परंतु इस निर्णय से यह साफ ज़ाहिर हो गया है कि छत्तीसगढ़ की रमन सरकार की नज़रों में राज्य का राजस्व तथा शराब का व्यापार ज़्यादा अहमियत रखता है न कि छत्तीसगढ़ के लोगों का स्वास्थय तथा उनका विकास। अन्यथा डा० रमन सिंह भी नितीश कुमार की ही तरह राज्य में शराब के प्रतिबंध के हिमायती होते, राज्य सरकार के संरक्षण में शराब की बिक्री के नहीं। बड़ी अजीब सी बात है कि मुख्यमंत्री ने इस फैसले की तुलना नोटबंदी के फैसले से करते हुए यह कहा कि कैबिनेट का यह निर्णय नोटबंदी की तरह कोचियाबंदी के लिए लिया गया है। उनके अनुसार गांवों की समस्या वहां की शराब की दुकानें नहीं बल्कि अवैध शराब बेचने वाले कोचिए और उनका आतंक था। सरकार शराब बेचेगी तो कोचियों और ठेकेदार के लोग अवैध शराब नहीं बेच सकेंगे।

डा० रमनसिंह का यह तर्क सही है या हास्यास्पद इस विषय पर चिंतन करना भी ज़रूरी है। क्या अवैध शराब या नकली शराब की बिक्री रोकने के लिए यही एक उपाय है कि सरकार स्वयं शराब बेचने लग जाए? छत्तीसगढ़ सरकार का यह निर्णय बिहार व छत्तीसगढ़ राज्य के शासकों की दूरदर्शिता का तुलनात्मक अध्ययन करने की भी प्रेरणा देता है। छत्तीसगढ़ भी गरीबी के मामले में बिहार से कम नहीं है। यहां भी राज्य में एक बड़े नक्सल प्रभावित क्षेत्र में गरीबी व भुखमरी जैसा माहौल है। यहां का बड़ा वनवासी क्षेत्र गरीब व आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है। इन लोगों के बारे में सरकार को इनके विकास की चिंता करनी चाहिए न कि इस बात की कि यह बेचारे नकली शराब पीने के बजाए शुद्ध शराब पिएं और यह शुद्ध शराब इन्हें मुहैया कराने का जि़म्मा राज्य सरकार उठाए। परंतु छत्तीसगढ़ में ऐसा ही किया गया है जबकि नितीश कुमार ने एक बड़े राज्य का मुख्यमंत्री होने के बावजूद तथा इस बात का अंदाज़ा लगाने के बावजूद कि शराब बंदी की नीति से राज्य को लगभग चार हज़ार करोड़ रुपये प्रतिवर्ष का नुकसान उठाना पड़ेगा, फिर भी नितीश कुमार ने राज्य के लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए पूर्ण शराबबंदी घोषित कर दी।

इसमें कोई संदेह नहीं कि शराब उत्पादन से लेकर इसकी बिक्री तक में शरीक लोगों के रसूख केंद्र से लेकर लगभग सभी राज्य सरकारों के सत्ताधीशों तक बहुत गहरे हैं। और ज़ाहिर है इस व्यवसाय से जुड़े लोग कभी भी शराबबंदी के हिमायती नहीं हो सकते। ऐसे में यह शासकों के अपने विवेक पर निर्भर है कि वे राजस्व की उगाही को प्राथमिकता देते हुए देश के आम नागरिकों को शराब के सेवन की ओर धकेलने हेतु प्रोत्साहित करें या आम लोगों के जीवन,उनके स्वास्थय,विकास तथा परिवार व समाज की खुशहाली के मद्देनज़र राजस्व की परवाह किए बिना शराबबंदी की ओर अपने कदम आगे बढ़ाएं? ज़ाहिर है जब हमारा समाज समग्र रूप से स्वस्थ,खुशहाल तथा आत्मनिर्भर रहेगा तो शराबबंदी के बावजूद यही समाज शराबबंदी के कारण होने वाले राजस्व के नुकसान की भरपाई स्वयं कर सकेगा। परंतु शराब की बिक्री के नाम पर सरकार द्वारा राजस्व की उगाही करना और जनता को शराब के सेवन हेतु प्रोत्साहित कर उसके अपने व उसके परिवार के जीवन से खिलवाड़ करने के सिवा और कुछ नहीं। जनता को भी इस विषय पर गंभीरता से सोचने की ज़रूरत है कि देश की तरक्की व खुशहाली के लिए शराब पर प्रतिबंध आवश्यक है या शराब की बिक्री को राज्य सरकारों द्वारा संरक्षण दिया जाना?