महाराष्ट्र निकाय चुनावों के संदेश

जब मुंबई के मतदाताओं ने चुनाव का रिकॉर्ड तोड़ा तो लग गया कि इस बार उनके बीच ज्यादा आलोड़न है। यह आलोड़न अकारण नही हो सकता। परिणाम ने बता दिया कि मतदाताओं के बीच भाजपा और शिवसेना दोनों के आपसी संघर्ष को लेकर आक्रामक विभाजन था। सामान्यतः लंबे समय की साथ वाली दो पार्टियों के बीच लड़ाई होती है तो लाभ तीसरे चौथे दलों को मिलता है। किंतु केवल वृहन्मुंबई महानगरपालिका ही नहीं, पूरे महाराष्ट्र के 10 बड़े शहरों के नगर निकायों के चुनावों में यह सिद्धांत एक बार फिर असफल हो गया। मतदाताओं ने वरण किया तो भाजपा और शिवसेना का तथा कांग्रेस एवं राकांपा को लगभग नकार दिया। यानी मतदाता भारी संख्या में निकले तो उनके बीच प्रतिस्पर्धा इस बात की थी कि भाजपा एवं शिवसेना में वे किसको आगे रखना चाहते हैं। यह कोई सामान्य परिणाम नहीं है। बिना किसी हिचक के यह स्वीकार किया जाएगा कि इस परिणाम ने किसी एक दल को उत्साहित किया है तो वह भाजपा। 1997 में शिवसेना से गठबंधन होने के बाद से वह हमेशा उससे पीछे रहती थी। इस बार अकेले लड़कर वह मुंबई मेें शिवसेना से केवल दो सीटें पीछे रही है। यानी उसके पास पहुंच गई। शिवसेना को यह गुमान था कि उनके बगैर भाजपा की कोई ताकत नहीं यह 2014 के विधानसभा चुनाव के दौरान  भी मतदाताओं ने गलत साबित किया जब भाजपा को सबसे ज्यादा 122 सीटें दीं और शिवेसना को केवल 63। लेकिन शिवसेना इस बदलते हवा के रुख को शायद समझने के लिए तैयार नहीं थी। मतदाताओं ने उसे दोबारा यह समझाया कि आपका भविष्य भाजपा के साथ रहने में ही है। अगर वह नहीं समझती तो कोई कुछ नहीं कर सकता।

वास्तव में निकाय चुनाव परिणामों की ओर देश भर का ध्यान वैसे तो कई कारणों से था। लेकिन इसमें एक यह था कि शिवसेना और भाजपा के बीच अंतिम रुप से तलाक इस परिणाम पर निर्भर करेगा। भाजपा शिवसेना के बीच गठबंधन टूटने का मतलब केवल महाराष्ट्र की राजनीति में ही परिवर्तन नहीं, आने वाले राष्ट्रपति चुनाव में भी भाजपा के सामने अपने उम्मीदवार को विजय दिलाने के मार्ग में बाधा खड़ी होना है। अगर इसमें भाजपा बुरी तरह पीछे रह जाती तो इस समय तक देश में न जाने कैसा राजनीतिक वातावरण बनाने की कोशिश हो रही होती। महाराष्ट्र के लोगों ने मुंबई एवं ठाणे जैसे गढ़ में शिवसेना को नकारा नहीं किंतु भाजपा को उसने 10 में से 8 शहरों में पहले नंबर की पार्टी बना दिया। अगर इसे भाजपा एवं शिवसेना दोनों के लिए अस्मिता का सवाल मान लें तो भाजपा के लिए यह सोने में सुगंध जैसा परिणाम है। इस समय उसकी सफलता शिवसेना के लिए धक्का अवश्य है। मुंबई में यदि मतदाताओं ने शिवेसना को 227 में से 114 स्थान दे दिया होता तो उसका तेवर कैसा होता इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। अब हालत यह है कि या तो दोनों मिलकर मुंबई महानगरपालिका को चलाएं तथा आपसी सहमति से मेयर चुनें या फिर शिवसेना और कांग्रेस का गठजोड़ हो। अगर शिवसेना कांग्रेस के बीच गठजोड़ होता है तो फिर यह प्रदेश ही नहीं देश की राजनीति के लिए अजीबोगरीब स्थिति होगी। ऐसी स्थिति में कांग्रेस के सेक्यूलरवाद का क्या होगा और सेक्यूलर राजनीति के नाम पर राजनीति करने वाले दलों का सुर क्या होगा? ये दोनों प्रश्न इसके सामने नत्थी हैं। इस तरह कांग्रेस और शिवसेना के साथ जाने की संभावना न के बराबर है।

यह चुनाव कांग्रेस तथा राकांपा दोनों के लिए ऐसा गहरा धक्का है जिससे उबरना उनके लिए आसान नहीं होगा। 1960 में महाराष्ट्र राज्य बनने के बाद कांग्रेस को नगर निकायों के चुनाव में ऐसी बुरी पराजय पहली बार मिली है। इसका अर्थ यह हुआ कि 2014 के लोकसभा चुनाव तथा विधानसभा चुनावों के बाद उनकी पराजय का सिलसिला लगातार जारी है। कांग्रेस इसका जो भी विश्लेषण करे, लेकिन विचार करिए यदि भाजपा और शिवसेना की आपसी लड़ाई में भी इनकी बुरी पराजय हो रही है, इनकी सीटें घट रहीं हैं तो फिर इनका चुनावी पुनरुद्धार किस स्थिति में होगा? कांग्रेस राकांपा के लिए इससे बड़ा अवसर अपनी वापसी का हो ही नहीं सकता था। साफ है कि महाराष्ट्र में कांग्रेस ऐसी हालत में भी नहीं बची कि अपनी प्रतिस्पर्धी की लड़ाई का लाभ उठा सके। कांग्रेस के लिए फिर से गंभीर आत्मचिंतन का समय आ गया है। आखिर वह लगातार क्यों चुनाव हार रही है? महाराष्ट्र में इस चुनाव के बाद तो उसके साथ राकांपा के अस्तित्व पर भी खतरा पैदा हो गया है। पुणे जैसे शरद पवार और अजीत पवार के गढ़ में भाजपा ने उनके वर्चस्व को ध्वस्त कर दिया है। पिंपरी-चिंचवड में भी भाजपा ने उससे सत्ता छीन ली। कांग्रेस की पराजय का सामान्य कारण यही माना जा रहा है कि उनके बीच अंदरुनी कलह चरम पर है तथा ऐसा कोई बड़ा चेहरा नहीं जिसे देखकर उसे लोग मतदान कर सके। राकांपा के बारे में ऐसा नहीं कहा जा रहा है, क्योंकि उसके पास अभी शरद पवार जैसे चेहरे हैं, किंतु पार्टी पर भ्रष्टाचार का जो आरोप लगा है वह उसके लिए भारी पड़ रहा है। साथ ही पुणे जैसे शहर की मानवीकी संरचना काफी बदल चुकी है। देश भर से युवा वहां सूचना तकनीक और अन्य आधुनिक शिक्षा के लिए जाते हैं। इस कारण वह पहले की तरह परंपरागत सोच वाले मराठावाद का गढ़ रहा नही। उसका चरित्र एक कॉस्मोपोलिटन शहर का हो गया है।

वास्तव में कांग्रेस और राकांपा दोनों ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव के बाद आत्मविश्लेषण करके पार्टी के संगठनात्मक और वैचारिक बदलाव का कोई कदम उठाया ही नहीं। वे दोनों बार एक तात्कालिक घटनाक्रम मानते रहे। इसलिए यहां से प्रश्न उठेगा कि अब कांग्रेस का क्या होगा….राकांपा का क्या होगा? आप माने या न माने चाहे भाजपा जीते या शिवसेना…महाराष्ट्र में केसरिया का विस्तार ही नहीं हुआ है वह स्थिर और सुदृढ़ हो रहा है। भाजपा को इन चुनावों में सिर्फ शहरों में ही नहीं, बल्कि ग्रामीण इलाकों भी बढ़त मिली है। चूंकि नगर निकायांें के चुनाव थे इसलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कोई सभा नहीं रखी गई थी। हालांकि बैनरों और पोस्टरों में उनके चित्र भी होते थे। बिना उनके मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस दे महाराष्ट्र के नेताओं के साथ ही प्रचार किया। तो इसका अर्थ यह हुआ कि महाराष्ट्र के मतदाताओं में अभी केन्द्र की मोदी सरकार तथा प्रदेश की फडणवीस सरकार के संदर्भ में सत्ता विरोधी रुझान नहीं है। यानी दोनों के शासन के तरीके को लोगों ने स्वीकार किया है। ध्यान रखिए महाराष्ट्र के कुल 3 करोड़ 77 लाख 60 हजार 812 यानी करीब एक चौथाई मतदाताआंें का यह चुनाव था। इससे अब यह संभावना बन रही है कि कहीं मध्यप्रदेश तथा छत्तीसगढ़ की तरह भाजपा अपने विजय को लगातार दोहराने न लगे। कम से कम इस समय तो कांग्रेस और राकापंा की वापसी का कोई संकेत तलाशना मुश्किल है। दोनों पार्टियों की ओर से जो बयान आए हैं उनसे नहीं लगता कि वे अभी भी पराजय के कारणों की गहराई से छानबीन कर उससे निकलने के लिए संकल्पबद्ध होकर कष्टकारी परिवर्तन को तैयार हैं। कम से कम कांग्रेस में तो ऐसा कुछ दिख नहीं रहा।

शिवसेना, कांग्रेस, राकांपा तीनों यह मानते रहे कि विमुद्रीकरण के कारण लोगों में असंतोष है और इससे वे भाजपा के खिलाफ मतदान करेंगे। ऐसा नहीं हुआ तो इसका क्या अर्थ निकाला जाए? यानी हम जितना समझ रहे हैं उतना गुस्सा लोगों के अंदर विमुद्रीकरण को लेकर नहीं है। ऐसा होता तो उनके सामने भाजपा को मजा चखाने का विकल्प मौजूद था। ध्यान रखिए, विमुद्रीकरण यानी 8 नवंबर के बाद ये यह 8वां चुनाव था जिसमें भाजपा को सफलता मिली है।  इसके पहले भाजपा उड़ीसा और गुजरात के स्थानीय निकाय चुनावों के साथ मध्यप्रदेश एवं राजस्थान के साथ हरियाणा के फरीदाबाद तथा चंडीगढ़ के चुनावों में बेहतर प्रदर्शन कर चुकी है। अब वह महाराष्ट्र में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। जब मुंबई जैसे शहर में, जहां से विमुद्रीकरण के बाद हाहाकार की रिपोर्टें दिखाईं जा रहीं थी, यह हालत है तो अन्य जगहों में क्या हो सकता है। जाहिर है, महाराष्ट्र स्थानीय निकाय चुनावों के बाद भाजपा विरोधी सारे दलों को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ेगा जो मानकर चल रहे थे कि विमुद्रीकरण को जोर-शोर से उठाकर उस पटकनी दे दंेंगे और विजय प्राप्त कर लेंगे।

-अवधेश कुमार