रिजिजु के कथन पर सकारात्मक नजरिए से भी विचार किया जा सकता है

हमारे देश की समस्या है कि हम कई बार तथ्यों की अनदेखी करते हैं और सच बोलने से कतराते हैं। भारत में मुस्लिम हिन्दू मुद्दों के बारे में तो यह सच्चाई शत-प्रतिशत सही है। यह बात समझ से परे है कि अगर मुसलमानों के बारे मंें कोई ऐसा तथ्य है जो चिंताजनक है तो उसे सामने लाने में क्या समस्या है। हां, उसे सामने लाने के पीछे यदि सांप्रदायिक सोच है या कोई कुत्सित मनोवृत्ति है तब अवश्य यह अवांछनीय है, अन्यथा वह तथ्य सामने आना चाहिए और उस पर गंभीरता से संतुलित चर्चा होनी चाहिए ताकि उस चिंताजनक स्थिति से निपटा जा सके। गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा है कि भारत में हिंदुओं की आबादी कम हो रही है। इसकी वजह ये है कि हिंदू लोगों का धर्म परिवर्तन नहीं कराते। रिजिजू ने ये बातें अरुणाचल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उस आरोप के जवाब में कही जिसमें आरोप लगाया गया था कि भाजपा सरकार राज्य को हिंदू राज्य में तब्दील करने की कोशिश कर रही है। तो यह बयान आरोप के जवाब मंे आया है। हम उसमें यहां नहीं जाना चाहते, क्योंकि भारतीय संविधान ने देश को सेक्यूलर माना है और जब तक यह है राज्य तो छोड़िए देश भी मजहबी देश नहीं हो सकता। लेकिन रिजिजू के बयान पर जिस तरह का हंगामा मचा है क्या वह उचित है? क्या रिजिजू ने जो कहा वह गलत है?

यह तो सच्चाई है कि अन्य कई धर्म जहां लोगों का धर्म परिवर्तन करने मंे विश्वास करते हैं और धर्मकार्य के रुप में उसे अंजाम देते हैं वही हिन्दू धर्म का इतिहास कभी ऐसा नहीं रहा। हिन्दू धर्म का चरित्र भी धर्मांतरण का नहीं है। वैसे भी हमारे यहां जाति व्यवस्था इतना सशक्त है कि किसी को यदि हिन्दू बनाना चाहें तो पहला प्रश्न यही उठेगा कि उसे किस जाति में लाया जाए। इसका निदान आसान नहीं है। लेकिन क्या हिन्दुओं की आबादी वास्तव में कम हो रही है? सबसे पहले तो इसी प्रश्न का उत्तर तलाशना होगा। उसके बाद यह प्रश्न आएगा कि अगर कम हो रहा है तो क्या इसीलिए ये धर्मांतरण नहीं कराते? इसके साथ ही यह प्रश्न भी जुड़ा है कि क्या दूसरे धर्म की आबादी भारत में बढ़ रही है? अगर बढ़ रही है तो क्या इसका कारण यही है कि वे धर्मांतरण कराते हैं? पहले यह देखें कि क्या वाकई हिन्दुओं की आबादी घट रही है? इसका उत्तर है, हां। 2011 की जनगणना के अनुसार हिन्दुओं की संख्या भारत की कुल आबादी का 79.6 प्रतिशत है। 2001 में हिन्दुओं की आबादी 80.46 प्रतिशत, 1991 में 81.55 प्रतिशत, 1981 में 82.30 प्रतिशत थी…। इसी क्रम में आगे बढते जाएंगे तो हिन्दुओं की आबादी घटने का सच आपके सामने आता जाएगा। आजादी के बाद जब पहली जनगणना 1951 में हुई उस समय हिन्दुओं की आबादी 85 प्रतिशत थी। उस समय से तुलना करें तो करीब साढे पांच प्रतिशत आबादी हिन्दुओं की घटी है। इस तरह हिन्दुओं की आबादी घटने का रिजिजू का कथन बिल्कुल सही है।

अब जरा यह देखें कि क्या दूसरे मजहबों में से किसी की आबादी बढ़ी है?  अन्य मजहबों में सबसे पहले मुसलमानों की ओर नजर जाता है। 2011 की जनगणना के अनुसार मुसलमानों की संख्या हमारे यहां कुल आबादी का 14.2 प्रतिशत है। 2001 में इनकी संख्या थी, 13.43 प्रतिशत तो 1991 में 12.61 प्रतिशत तथा 1981 में 11.75 प्रतिशत…..। आप इसे भी क्रम में गिनते जाइए हर जनगणना में मसुलमानों की आबादी बढ़ती हुई मिलेगी। वैसे भी 1951 की जनगणना में भारत मंे 9.9 प्रतिशत मुस्लिम आबादी थी। इस तरह उस समय से इनकी आबादी करीब साढ़े चार प्रतिशत बढ़ी है। तो एक ओर हिन्दुओं की आबादी उस समय से घटी है और मुसलमानों की बढ़ी है। हालांकि 1991 से 2001 के बीच मुस्लिम आबादी बढ़ने की दर 29 प्रतिशत थी, जबकि 2001 से 2011 के बीच यह 24 प्रतिशत रही। तो आबादी बढ़ने की दर में ह्रास आया है और 2021 की जनगणना में देखना होगा कि यह कितना रहता है। किंतु यह दर भी औसत 18 प्रतिशत आम वृद्धि दर से ज्यादा है। जो लोग आबादी बढ़ने पर चिंता प्रकट करते हैं उनके लिए यह गहन विमर्श का कारण होना चाहिए। आखिर एक समुदाय विशेष की आबादी लगातार क्यों बढ़ती जा रही है? क्या इससे आबादी असंतुलन पैदा हो सकता है? क्या इसके सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक दुष्परिणाम भी हो सकते हैं?

किरण रिजिजू ने इन सब पर कुछ नहीं कहा है। मामला अरुणाचल प्रदेश का था किंतु रिजिजू का बयान पूरे देश के संदर्भ में है। हम इसमें आगे बढ़ें उसके पहले अरुणाचल की आबादी का एक आंकड़ा यहां देना आवश्यक है।  अरुणाचल प्रदेश में 2001 में हिन्दुओं की आबादी 34.6 प्रतिशत थी जो 2011 में घटकर 30.26 रह गई। इसके समानांतर वहां ईसाइयों की आबादी 18.7 प्रतिशत से बढ़कर 30.28 प्रतिशत हो गई। यह भी एक तथ्य है जिस पर विचार होना चाहिए कि ऐसा क्यों हुआ? एक बात तो समझ में आती है कि यदि हिन्दू ईसाई और इस्लाम की तरह धर्म परिवर्तन का अस्त्र अपनाते तो इनकी संख्या बढ़ सकती थी। किंतु उनकी संख्या कम होने का कारण क्या केवल धर्म परिवर्तन है। क्या आजादी के बाद से हिन्दुओं का इतना ज्यादा धर्म परिवर्तन हो गया कि उनकी संख्या घटती गई और मुसलमानों की बढ़ती गई? वैसे किरण रिजिजू सामान्य सांसद या नेता नहीं हैं। गृहराज्य मंत्री होने के नाते उनके पास यदि इस संबंध में कुछ तथ्य हैं तो उसे भी सामने लाना चाहिए। यही बात अरुणाचल के संदर्भ में भी लागू होती है। यदि उनके पास इस बात की सटीक रिपोर्ट है कि अरुणाचल में व्यापक पैमाने पर धर्म परिवर्तन हुआ है और उसमें कानून का उल्लंघन किया गया है तो उसे भी सामने लाना चाहिए।

हालांकि एक सीमा तक हिन्दुओं की आबादी घटने तथा दूसरे धर्म की आबादी बढ़ने के पीछे धर्म परिवर्तन कारण हो सकता है। इसकी शिकायतें भी जगह-जगह आईं और भारत के कई राज्यों ने इससे संबंधित कानून भी बनाए ताकि धर्म परिवर्तन में भय या लोभ लालच का इस्तेमाल न किया जा सके। पिछले कम से कम तीन दशकों में भारत में धर्म परिवर्तन के विरुद्ध इतने अभियान चले हैं कि आज यह आसान नहीं रह गया है। इसलिए कम से कम 1991 से 2011 तक की जनसंख्या में कमी और वृद्धि को एकदम से धर्म परिवर्तन का परिणाम नहीं बताया जा सकता है। असम में मुसलमानों की आबादी 1991 से 2011 के बीच सबसे ज्यादा बढ़ी है। उसका कारण बंगलादेश से आए घुसपैठिए माने जा रहे हैं। किंतु पूरे देश में इनकी आबादी बढ़ने का सामाजिक-आर्थिक अध्ययन तथा आम अनुभव भी यह बताता है कि हिन्दुओं, सिख्खों ने जहां परिवार नियोजन को व्यापक पैमाने पर अपनाया उस तरह मुसलमानों ने नहीं अपनाया है। बहुमत हिन्दुओं में परिवार को सीमित रखने पर सजगता है और इसके लिए वे परिवार नियोजन के कई साधन अपनाते हैं। इसके विपरीत इस्लाम में कुछ मजहबी नेताआंें ने इसे इस्लाम विरोधी घोषित कर दिया। कुछ मु्ट्ठी भर पढ़े-लिखों को छोड़ दें तो इस कारण आम मुसलमान परिवार नियोजन के साधन अपनाने से बचते हैं। तो इस मानसिकता में बदलाव लाने की आवश्यकता है। किंतु यह तभी होगा जब हम ईमानदारी और साहस के साथ इसे सार्वजनिक तौर पर स्वीकार करेंगे। अगर हम इस आधार पर सच बोलने से बचेंगे कि कहीं हमारी छवि पर सेक्यूलर विरोधी या सांप्रदायिक होने का ठप्पा न लगा दिया जाए तो इसका निदान नहीं हो सकता। तो सबसे पहले सच को स्वीकारने की आवश्यकता है। उसके बाद इसके निदान का रास्ता पकड़ा जा सकता है। वह यही हो सकता है कि आम मुस्लिम आबादी के बीच व्यापक पैमाने पर जन जागरण अभियान चलाया जाए ताकि वे भी परिवार नियोजन के साधन अपनाने की ओर अग्रसर हों। जो कट्टरपंथी तत्व इसके विरुद्ध प्रचार कर इसे मजहब का विषय बना रहे हैं उनको कमजोर करने की जरुरत है। किंतु हमारे यहां राजनीति का जो चरित्र है उसमें ऐसा होना आसान नहीं। जब वोट की लालच में इस्लाम में कट्टरपंथियों को नेता मानकर उनका सम्मान किया जाएगा और जो प्रगतिशील हैं उन्हें महत्व नहीं दिया जाएगा तो यह संभव कैसे हो सकता है।

-अवधेश कुमार