महान स्वतंत्रा सेनानी, प्रखर पत्रकार कन्हैयालाल वैद्य

कन्हैयालाल वैद्य भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी स्वतत्रंता संग्राम सेनानियों मंें एक थे। उन्होंने गांधीजी के नेतृत्व में देश की आजादी के लिये हिस्सा लिया। उन्होंने बहुत कम उम्र मंे देश की आजादी का संकल्प लिया था। कन्हैयालाल जी वैद्य महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तो थे ही, प्रखर पत्रकार भी थे। देश की आजादी से पहले तथा बाद में वे देश के लगभग 40 से अधिक समाचार पत्रों के संवाददाता थे। हिन्दी और अंग्रेजी भाषा पर उनका पूरा नियंत्रण था। सभी समाचार पत्रों में वे नियमित रूप से समाचार भेजा करते थे। उनके यहां देश के बहुतायत समाचार पत्र आते थे। वैद्य जी राज्यसभा के सदस्य भी रहे इस प्रकार उन्होंने देश की संसद मंे भी देश की सेवा का अवसर प्राप्त किया। वैद्य जी का जन्म स्थान आदिवासी अंचल झाबुआ जिले के छोटे सा कस्बा थांदला था। जब देश आजाद हुआ उसके बाद उन्होंने राजा महाराजाओं की रियासतों को समाप्त करने के लिये भी संघर्ष किया। यानि उनका जीवन आजादी के बाद भी इस देश के नागरिकों को समान अधिकारों को दिलाने के लिये संघर्षरत रहा। उनका कार्यक्षैत्र देशी रियासतों में फैला हुआ था। अखिल भारतीय देशी राज्य प्रजा परिषद के वे एक जुझारु नेता थे। राजा महाराजा उनसे कांपते थे। अनेक राज्यों ने उन्हें अपने राज्य में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा रखा था।

नरेश सोनी ‘स्वतंत्र पत्रकार’

तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरु ने उनसे वायदा किया था कि आजादी के बाद सबसे पहला कार्य रियासतों को समाप्त करने का होगा। किन्तु जब नेहरु जी ने यह वादा पूरा नहीं किया तो उन्होंने रियासतों को मुक्त कराने का आंदोलन छेड़ दिया। प्रारंभ में झाबुआ राज्य देशी राज्य लोक परिषद की स्थापना में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई फिर बाद में मध्य भारत देशी राज्य लोक परिषद की स्थापना की जिसके वे प्रधानमंत्री बने। उन्होंने राज्यों में गरीबों, दलितों पर होने वाले जुल्म के खिलाफ जब संघर्ष किया और जन अध्ािकारों की मांग की तो उन्हें झाबुआ राज्य से सपरिवार निर्वासित किया गया एवं उनकी संपत्ति जब्त कर ली गई। उन्होंने इन कठिन परिस्थितियों का सामना किया लेकिन संघर्ष जारी रखा।

आजादी के बाद नेहरू जी के कहने पर राष्ट्र के निर्माण के संकल्प हेतु वे स्वतंत्र भारत की प्रथम संसद में मध्य भारत से सर्वाधिक मतों से चुनकर राज्यसभा के सदस्य बने। मध्यप्रदेश के निर्माण में उनकी अहम भूमिका थी। रियासतों के विलय के आंदोलनों में भूमिका निभाई तथा राज्य में शिक्षा विकास की आवश्यकता को महसूस करते हुए उन्होंने विक्रम विश्वविद्यालय की स्थापना में भी महती भूमिका का निर्वाह किया। उन्होंने ग्वालियर में कपड़ा मिल मजदूरों के लिये संघर्ष किया, वाहन चालकों के लिये, पोस्टमेन के लिये उनको अधिकार दिलाने के लिये उन्होंने तीन दिन तक भूख हड़ताल की।

वैद्य जी स्वयं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। आजादी के पश्चात स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को देखकर म.प्र. स्वतंत्रता सेनानी संघ की स्थापना की और सेनानियों को दी जाने वाली राशि जिसे शासन पेंशन शब्द कहता था उसके स्थापना पर सम्मान-निधि शब्द करवाया।

उनके तत्कालीन अभिन्न साथी प्रखर पत्रकार ठाकुर शिवप्रतापसिंह जी ने 29 अगस्त 1978 के दैनिक अग्निबाण के अपनी संपादकीय में लिखा है ‘‘स्व. कन्हैयालाल वैद्य शब्द के वास्तविक अर्थ में विद्रोही थे ऐसे विद्रोही कि जीवन के अंतिम क्षणों तक शोषण, उत्पीड़न, अन्याय और अत्याचार के खिलाफ निरंतर दहाड़ते ही रहे उनको काबू में करने अथवा मेमना बनाने में भूतपूर्व राजा महाराजा, जनतांत्रिक व्यवस्था के सत्ताधारी और शोषक एवं उत्पीडक सभी फेल हो गये थे। उन्होंने हंसते-हंसते घोर आर्थिक अभावों एवं संकटों का मुकाबला किया। और कभी भी उफ तक न किया।’’ ठाकुर साहब आगे लिखते हैं ‘‘उनके देहवसान से उज्जैन का छत्रीचैक श्मशान जैसा हो गया है। हर आठवें दसवें दिन किसी न किसी ज्वलंत समस्या पर वैद्य जी दहाड़ते हुए नजर आते थे वह धाराप्रवाह बोलते थे व्यंग्य और तीक्ष्ण आलोचना के जब वह तीर चलाते थे तो लगता था कि कोई क्रुद्ध एवं अनियंत्रित सिंह चिंघार रहा हो। वैद्य जी वास्तव में नरशार्दूल थे। न केवल वह महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वरन दिग्गज पत्रकार भी थे। उनको भूलना बहुत बड़ी और अक्षम्य कृतघ्नता होगी।’’ महान सेनानी कन्हैयालाल जी वैद्य को उनकी जयंती पर सादर प्रणाम।