वर्ष 2016 में कांग्रेस: मां की छाया से बाहर निकले राहुल, संघर्ष करती रही पार्टी

नयी दिल्ली,  चुनावों में कांग्रेस की निरंतर हार के बाद राहुल गांधी ने वर्ष 2016 में पार्टी नेताओं की कतार में खुद को आगे किया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आक्रामक रूख अपनाया जिसके बाद शायद उनको यह उम्मीद है कि साल 2017 में और आगे भी उनकी सियासी यात्रा सुगम एवं सफल होगी।

गुजरे साल में कांग्रेस उपाध्यक्ष ने सभी प्रमुख मुद्दों पर भाजपा के खिलाफ आक्रामक रूख अपनाया। चाहे नोटबंदी का मामला हो, लक्षित हमले का मुद्दा हो या फिर जेएनयू विवाद हो, राहुल ने केंद्र की मोदी सरकार एवं भाजपा को घेरने की भरपूर कोशिश की।

कांग्रेस के लिए यह सुखद स्थिति रही कि राहुल अपनी मां और पार्टी अध्यक्ष सोनिया की छाया से बाहर निकले, लेकिन चुनावी हार 2016 में भी पार्टी के लिए परेशानी की सबब बनी रही।

कांग्रेस असम और केरल में मई, 2016 के विधानसभा चुनाव में क्रमश: भाजपा एवं वाम मोर्चा नीत गठबंधन से हार गई। इससे वर्ष 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी की जगी उम्मीद भी बहुत हद तक धूमिल हुई।

अरूणाचल प्रदेश में भी उच्चतम न्यायालय से शुरूआती राहत मिलने के बाद कांग्रेस को उस वक्त बड़ा झटका मिला जब उसकी पूरी राज्य इकाई और एक को छोड़कर सभी विधायकों ने बगावत करके नयी पार्टी बना ली तथा भाजपा के साथ मिलकर सरकार का गठन कर लिया।

राजनीतिक मोर्चे पर उत्तराखंड एकमात्र ऐसा राज्य रहा जहां कांग्रेस के लिए सुखद और सिर उंचा करने वाली स्थिति रही। केंद्र की ओर से राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने के बाद अदालती दखल से कांग्रेस की सरकार बहाल हुई।

पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने थोड़ी बढ़त हासिल की, लेकिन वाम मोर्चे के साथ गठबंधन को लेकर उसे असहज स्थिति पैदा हो गई।

संगठन के स्तर पर देखें तो बीमार चल रहीं सोनिया गांधी ने नेतृत्व की भूमिका से खुद को बहुत हद तक अलग कर लिया जिससे बेटे राहुल को एक तरह से उनकी भूमिका में आना पड़ा।

राहुल गांधी ने वर्ष 2016 में कई मौकों पर कांग्रेस का आगे बढ़कर नेतृत्व किया। नवंबर महीने में उन्होंने कांग्रेस कार्य समिति की बैठक की पहली बार अध्यक्षता की जिसमें यह सिफारिश करते हुए प्रस्ताव पारित किया गया कि राहुल कांग्रेस अध्यक्ष की भूमिका संभालें। बाद में 28 दिसंबर को राहुल ने पहली बार कांग्रेस के स्थापना दिवस समारोह की अगुवाई की। इस पूरी अवधि में सोनिया सार्वजनिक भूमिकाओं से दूर रहीं और नोटबंदी जैसे मुद्दे पर विपक्ष को साथ लेकर संसद में रणनीति बनाने में राहुल ने प्रमुख भूमिका निभाई।

वैसे, विपक्ष को साथ लेकर चलने में राहुल की क्षमता पर सवाल खड़े हुए क्योंकि शीतकालीन सत्र के आखिरी दिन वाम, सपा, बसपा, राकांपा, जदयू और द्रमुक के नेताओं ने नोटबंदी के मामले पर राष्ट्रपति से संयुक्त रूप से मुलाकात करने से खुद को अलग कर लिया।

विपक्ष की एकता भले ही बनती-बिगड़ती रही, लेकिन राहुल ने नोटबंदी के मुद्दे पर मोदी सरकार पर दबाव बनाए रखा और प्रधानमंत्री पर उद्योगपतियों से घूस लेने का आरोप लगाया। उन्होंने मोदी को स्वतंत्र जांच का सामना करने की चुनौती भी दी।

ओआरओपी के मुद्दे को लेकर राहुल ने खुद की गिरफ्तारी दी तो नोटबंदी के बाद एक दिन खुद एटीएम के बाहर कतार में खड़े हुए। उन्होंने हर वो कोशिश की जिससे वह दिखें और आक्रामक रूख रखने वाले नेता के तौर पर पहचाने जाएं।

नोटबंदी के मुद्दे पर मोदी सरकार को घेरने के लिए राहुल ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को आगे किया।

पीओके में सरकार की ओर से किए गए लक्षित हमले को लेकर उन्होंने पहले केंद्र सरकार का समर्थन किया, लेकिन बाद में मोदी पर ‘सैनिकों की खून की दलाली करने’ का आरोप लगाया।

जेएनयू नारेबाजी प्रकरण के बाद राहुल ने विश्वविद्यालय परिसर का दौरा किया और छात्रों के प्रति एकजुटता प्रकट की। रोहित वेमुला की खुदकुशी के बाद वह हैदराबाद विश्वविद्यालय गए। गुजरे साल कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने पार्टी छोड़ दी। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, उत्तर प्रदेश इकाई की पूर्व अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी और पश्चिम बंगाल में पार्टी के दिग्गज नेता सुदीप बर्मन ने कांग्रेस छोड दी।

उत्तर प्रदेश में चुनावी तैयारियों लेकर राहुल ने देवरिया से दिल्ली तक 2500 किलोमीटर की किसान यात्रा निकाली।

वर्ष 2017 में पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए काफी महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। ऐसे में देखना होगा कि राहुल की मेहनत किस हद तक रंग लाती है।