देशभक्ति की प्रेरणा का स्थल होगा शिवाजी स्मारक

तमाम विरोधों और सवालों को दरकिनार करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुंबई तट पर स्थित अरब सागर के एक द्वीप पर छत्रपति शिवाजी स्मारक की आधारशिला रख दिया। मोदी होवरक्राफ्ट के जरिए अरब सागर में उस जगह पहुंचे जहां शिवाजी की मूर्ति लगाई जानी है तथा जलपूजन किया। जब सरकार ने एक बार निर्णय कर लिया, उसके लिए जगह का चयन भी हो गया, पर्यावरण विभाग की सहमति मिल गई और लगभग धन का भी इंतजाम हो गया तो इस महत्वपूर्ण योजना के रुकने का सवाल कहां से पैदा होता है। सवाल पैदा भी नहीं होना चाहिए था। किंतु हमारे देश में ऐसे हर काम का विरोध होता है जिसमें देशभक्ति का भाव भरा हो या जिससे अदम्य साहस और देशभक्ति की प्रेरणा मिलती हो। इसके विरोध में औन लाइन अभियान तक चलाया गया है और अभी भी चल रहा है। मछुआरों को खड़ा किया जो कहते हैं कि इससे वहां की मछलियां भाग जाएंगी। पर्यावरणवादी खड़े हो जाए जो पर्यावरण के नुकसान की बात करने लगे। यानी जैसे ही यह साफ हो गया कि योजना रुकेगी नहीं हर तरफ से विरोध। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देेवेन्द्र फड़णवीस ने कहा भी कि छत्रपति शिवाजी स्मारक को भी रोकने की कोशिश की गई थी, लेकिन उन्हें कोई नहीं रोक पाया। हम किसी विरोध को परियोजना के आड़े नहीं आने देंगे। जब आधारशीला रख दी गई जल पूजन हो गया तो भी तर्क दिया जा रहा है कि यह 3600 करोड़ रुपए का अपव्यय है। महाराष्ट्र में जहां किसान आत्महत्या करते हों वहां इतना धन किसानों के कल्याण पर खर्च होना चाहिए था, जहां सूखे पड़ते हो वहां पीने के पानी के इंतजाम पर खर्च होना चाहिए था, आदि आदि। अगर इनकी बात मान ली जाए तो निष्कर्ष यह आएगा कि इन सारी समस्याओं की जड़ छत्रपति शिवाजी महाराज का स्मारक ही है।

वस्तुतः हमारा देश है तो ऐसा विरोध होगा लेकिन इनका कोई औचित्य नहीं है। मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस की सरकार ने कोई कृषि या किसान कल्याण बजट की कटौती करके शिवाजी स्मारक के लिए धन का आवंटन नहीं किया है। वैसे भी बजट हर वर्ष होता है, लेकिन शिवाजी स्मारक में बस एक बार धन खर्च होगा। बहरहाल, देशों में ऐसे स्मारक बनने ही चाहिए जो हमें कठिनाइयों में भी देश के लिए, समाज के लिए संकल्प के साथ संघर्ष करने, विजीत होने तथा लोकसेवा एवं धार्मिक सहिष्णुता अपनाने की प्रेरणा देते हों। इससे देश का मान बढ़ता है। प्रधानमंत्री मोदी ने ठीक ही ट्वीट किया कि छत्रपति शिवाजी महाराज साहसी, बहादुर और सुशासन की मिसाल हैं। शिव स्मारक उनके और उसकी महानता के लिए एक उपयुक्त श्रद्धांजलि है। लेकिन इस पर हम आगे चर्चा करेंगे। पहले स्मारक। करीब 15 एकड़ के द्वीप पर प्रस्तावित स्मारक समुद्र के किनारे से डेढ किलोमीटर अंदर होगा। छत्रपति शिवाजी महाराज का यह स्मारक 210 मीटर ऊंचा होगा। इस स्मारक में लगने वाले शिवाजी महाराज की मूर्ति की ऊंचाई घोड़े समेत 192 मीटर है। दुनिया में कहीं भी इतनी उंची मूर्ति नहीं है। तो यह दुनिया की सबसे उंची मूर्ति होगी। यह गुजरात में लगने वाली सरदार पटेल की प्रतिमा स्टैचू ऑफ यूनिटी से 10 मीटर ज्यादा ऊंची होगी। घोडे़ पर बैठे हुए छत्रपती शिवाजी महाराज के पुतले की उंचाई 114.4 मीटर है। इसका प्लेटमार्फ 77 मीटर का होगा। ये स्मारक करीब 13 हेक्टेयर के चट्टान पर बनाया जाएगा। यहां एक समय में 10 हजार लोग एक साथ आ सकते हैं। इस स्मारक पर एक एम्पीथिएटर, मंदिर, फूड कोर्ट, लाइब्रेरी, ऑडियो गायडेड टूर, थ्री डी-फोर डी फिल्म, एक्वेरियम जैसी सुविधाए होंगी।

जो लोग अभी विरोध कर रहे हैं वे शायद यह नहीं समझ पा रहे हैं कि यह पर्यटकों के लिए भी कितना बड़ा स्मारक स्थल हो जाएगा। अगर आर्थिक दृष्टि से देखें तो इससे भी हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा एवं करोड़ों की स्थायी आय होगी। किंतु विरोधियों को तो बस बहाना चाहिए। दरअसल, इस देश में जिनको शिवाजी और उनके जैसे महापुरुषों के नाम से चीढ़ है वो विरोध का कोई न कोई बहाना निकालेंगे ही। बस, खुलकर शिवाजी नाम का विरोध नहीं कर सकते, क्योंकि उनके प्रति महाराष्ट्र में इतना सम्मान का भाव है कि विरोधियों को ही जन विरोध का सामना करना पड़ जाएगा। तो बहाने से विरोध किया जा रहा है। कुछ लोगों की समस्या यह भी हो सकती है कि इससे भाजपा और शिवसेना अपनी राजनीति साध रही है। भाजपा शिवसेना राजनीतिक दल हैं, इसलिए इसका राजनीतिक लाभ हानि की गणना भी संभव है उन्होंने की होगी। वे सरकार में हैं और ऐसा करने जा रहे हैं तो इसका श्रेय उनको मिलेगा ही। वैसे महाराष्ट्र के किसी राजनीतिक दल ने इसका विरोध नहीं किया है। कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने तो इसका स्वागत किया। राकांपा ने भी स्वागत किया है। कांग्रेस का तो कहना है कि यह योजना उनकी सरकार की ही थी। वैसे यह सच है कि स्मारक बनाने की घोषणा करीब 10 वर्ष पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने की थी। हालांकि इस दिशा में ज्यादा काम नहीं हो सका और आज की सरकार इसमें बाजी मार ले गई है।

लेकिन ऐसे स्मारकों को राजनीतिक श्रेय की होड़ का विषय नहीं बनना चाहिए। वैसे इसके लिए बाजाब्ता कार्ययोजना ऐसी तैयार की गई जिससे यह पूरे महाराष्ट्र की एकता का प्रतीक बने। महाराष्ट्र के विभिन्न भागों में स्थित 300 से ज्यादा ऐतिहासिक किलों की मिट्टी एवं राज्य की सभी नदियों का जल एकत्रित किया गया। इसे चेंबूर स्थित शिवाजी प्रतिमा के पास महाराष्ट्र के दो वरिष्ठ मंत्रियों विनोद तावड़े एवं चंद्रकांत दादा पाटिल को सौंपा गया। चेंबूर से सजाए गए ट्रकों में मिट्टी एवं जल के कलश जुलूस की शक्ल में गेटवे ऑफ इंडिया पर लाए गए। वहां सभी कलशों से जल लेकर एक कलश तैयार कर उसे मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस को सौंपा गया। मुख्यमंत्री यह कलश एवं सभी किलों से आई मिट्टी प्रधानमंत्री के साथ लेकर समुद्र के बीच स्थित उस टापू पर गए, जहां यह स्मारक बनाया जाना है। प्रधानमंत्री ने किलों की मिट्टी एवं महाराष्ट्र की नदियों के जल से स्मारक की आधाशीला रखी। कई लोग इस पर भी आंख भौं सिकोड़ेंगे, लेकिन इन सबका भी प्रतीकात्मक महत्व है। आखिर हम नदियों को अपने यहां मोक्षदायिनी मानते हैं। महाराष्ट्र के किले किस बात के प्रतीक हैं ये बताने की आवश्यकता नहीं हैं। इनको एकत्रित करने के साथ सम्पूर्ण महाराष्ट्र के लोगों की भावना को इस स्मारक से जोड़ने की कोशिश की गई है। इसमें एक साथ वीरता, रक्षा और आध्यात्मिकता तीनों का सम्मिश्रण करने की कोशिश भी है। जलपूपजन कर आधाशीला रखते समय छत्रपति शिवाजी महाराज के दो वंशजों सांसद उदयनराजे भोसले एवं सांसद संभाजीराजे भोसले के भी उपस्थित होने की सूचना है।

शिवाजी को लेकर हमारे इतिहास में भी कुछ लोगों ने अन्याय किया है। यह ठीक है कि उस समय हिन्दू और मुसलमान की भावना समाज में विद्यमान थी। लेकिन यह इसलिए था, क्योंकि मुस्लिम शासक हिन्दुओं पर अत्याचार करते थे और शिवाजी ने इस अत्याचार से मुक्ति का प्रण लिया और उसे काफी हद तक पूरा किया। वे असाधारण वीरता, त्याग और बलिदान के मिसाल हैं। वास्तव में भारत की स्वतन्त्रता एवं गौरव की रक्षा करने वाले शिवाजी एक साहसी और सतर्क सैनिक, दूरदर्शी नेता व राजा तथा हर दृष्टि से सहिष्णु थे। वे हिन्दू संस्कृति को प्रोत्साहित करते थे किंतु हिन्दुत्व के प्रति उनका समर्पण सांप्रदायिक नहीं था। उनके राज मंें पूरी धार्मिक सहिष्णुता थी। उनके साथ उस समय के मुस्लिम शासकों ने लगातार जैसा व्यवहार किया उससे वे प्रतिक्रियावादी और मुस्लिम विरोधी हो सकते थे, पर ऐसा वे नहीं हुए। मुसलमानों को पूरी धार्मिक आजादी प्राप्त थी। कई मस्जिदों के निर्माण के लिए शिवाजी ने अनुदान दिया। उनके मराठा साम्राज्य में हिन्दू पण्डितों की तरह मुसलमान सन्तों और फ़कीरों को भी पूरा सम्मान प्राप्त था। उनकी सेना में मुसलमान सैनिक भी थे। यह भी ध्यान रखने की बात है कि उनके शासनकाल में कोई आंतरिक विद्रोह नहीं हुआ। एक साधारण जागीरदार के उपेक्षित पुत्र की स्थिति से अपने पुरुषार्थ द्वारा स्वाधीन राज्य की स्थापना कर उसका शासक बनना तथा लगातार युद्ध में फंसे रहने के बावजूद एक व्यवस्थित शासन-प्रणाली एवं सैन्य-संगठन की स्थापना सामान्य बात नहीं है। ऐसे महापुरुष के स्मारक का देश भर में स्वागत होना चाहिए। बल्कि इससे प्रेरणा लेकर दूसरे राज्यों के नेता अपने प्रदेशों के ऐसे गौरवमयी व्यक्तित्व का स्मारक बनाएं तो यह पूरे देश के लिए अच्छा होगा। जो देश अपने अतीत के महापुरुषों को भूल जाता है, उन्हें सम्मान नहीं देता वह धीरे-धीरे प्रेरणाविहीन, आदर्शविहीन होकर जड़ों से कट जाता है। वैसे देश का कोई भविष्य नहीं होता।

-अवधेश कुमार