उचित नहीं धार्मिक विषयों का राजनीतिकरण

हमारे देश में राजनेताओं द्वारा लोकलुभावन राजनीति किए जाने की शैली ने राजनीति का स्तर इतना गिरा दिया है कि अब प्राय: अधिकांश राजनैतिक दल ऐसे मुद्दों या विषयों की तलाश में रहते हैं जिससे देश को कोई फायदा हो या न हो परंतु लोगों को ऐसा प्रतीत होना चाहिए कि अमुक राजनैतिक दल या अमुक नेता समाज विशेष के हितों की बात कर रहा है। हद तो यह है कि अब राजनीति की यही शैली सामाजिक समस्याओं के अतिरिक्त धार्मिक मामलों में भी प्रवेश कर चुकी है। उदाहरण के तौर पर इन दिनों देश में मुसलमानों के एक सीमित वर्ग से जुड़ा तीन तलाक का मामला सुिर्खयों में छाया हुआ है। इस विषय को लेकर वह भारतीय जनता पार्टी मुस्लिम महिलाओं के प्रति अपनी हमदर्दी जताती नज़र आ रही है जो हमेशा दूसरे दलों द्वारा मुस्लिम हितों से संबंधित कोई भी बात किए जाने को केवल ‘तुष्टिकरण’ शब्द का ही ठप्पा लगा दिया करती थी। सवाल यह है कि क्या भारतीय जनता पार्टी या किसी दूसरे राजनैतिक दल को इस प्रकार के संवेदनशील धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करना चाहिए? और दूसरा सवाल यह भी कि क्या ऐसे गंभीर विषयों को अपने राजनैतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना नैतिकतापूर्ण राजनीति का तक़ाज़ा है?

 निर्मल रानी
निर्मल रानी

दरअसल तीन बार तलाक-तलाक-तलाक बोलकर किसी मुस्लिम पुरुष द्वारा अपनी पत्नी को तलाक दिए जाने की मान्यता मुस्लिम जगत के एक अत्यंत सीमित वर्ग में पाई जाती है। वास्तव में दुनिया का अधिकांश मुस्लिम समाज न तो तीन तलाक की इस व्यवस्था को मानता है न ही इसपर अमल करता है। यहां तक कि मुस्लिम महिलाओं द्वारा ही इस व्यवस्था को बड़े पैमाने पर नकारा जा रहा है तथा इसे समाप्त करने की लड़ाई लड़ी जा रही है। हमारे देश की अनेक शिक्षित मुस्लिम महिलाएं इस मुद्दे को अत्यंत मुखर रूप में उठा रही हैं। परंतु जब भारतीय जनता पार्टी तीन तलाक का विरोध करने वाली मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में उतरती दिखाई देती है उस समय भाजपा के मूल सिद्धांतों से आशंकित मुस्लिम समाज इस निष्कर्ष पर पहुंचने में देर नहीं लगाता कि हो न हो भाजपा द्वारा तीन तलाक के विरोध में मुस्लिम महिलाओं के समर्थन में खड़ा होना इस्लामी शरीया में दखलअंदाज़ी करने तथा इसी बहाने समान आचार संहिता लागू करने की दिशा में उठाया जाने वाला एक कदम है। और भाजपा की दखलअंदाज़ी व मुस्लिम नेतृत्व की यही सोच इस मामले का हल निकालने के बजाए इसे और अधिक पेचीदा बनाने में सहायक सिद्ध हो रही है।

हमारे देश में केवल मुसलमानों में ही नहीं बल्कि हिंदू धर्म में भी समाज संबंधी भी अनेक रीति-रिवाज व परंपराएं ऐसी हैं जिनकी रीतियों व परंपराओं के नाम पर अनदेखी की जाती रही है। उदाहरण के तौर पर हिमाचल प्रदेश के लाहौल स्पीति क्षेत्र में एक इलाका ऐसा है जहां हिंदू धर्म के लोग चार व पांच भाईयों के बीच एक ही पत्नी से विवाह करते हैं। दुनिया के किसी भी देश में शायद ऐसी व्यवस्था नहीं होगी। यह लोग धार्मिक परंपरा के नाम पर पांडवों की परंपरा का अनुसरण करने की दुहाई देते हैं तो दूसरी ओर इसका सामाजिक पहलू यह बताते हैं कि ऐसा करने से उनकी संपत्ति का बंटवारा नहीं होता। इसी प्रकार हिंदू धर्म में बहुविवाह प्रथा न होने के बावजूद आज भी देश के लाखों हिंदू एक से अधिक पत्नियां रखे हुए हैं। यहां तक कि देश की कई प्रतिष्ठित व जानी-मानी हस्तियां एक से अधिक पत्नियां रखे हैं। परंतु कानून का डंडा ऐसी जगहों पर नहीं चलता क्योंकि यह सबकुछ परस्पर सहमति के आधार पर होता है। ज़ाहिर है जब कोई आपत्ति करने वाला ही न हो तो कानून भी आिखर किसकी शिकायत पर संज्ञान ले? हिजाब या पर्दा भी एक ऐसी ही व्यवस्था है जिसे सीधे तौर पर मुस्लिम समुदाय से जोडक़र देखा जाता है। जबकि वास्तव में यह हमारी क्षेत्रीय परंपराओं में से एक है। हिंदू धर्म में भी आज भी घूंघट में बहुओं के रहने का रिवाज है चाहे वह कितनी ही उम्रदराज़ क्यों न हो जाएं। परंतु जब भी पर्दे की बात होती है तुरंत केवल मुस्लिम समाज को ही इस परंपरा का जि़म्मेदार मान लिया जाता है। दूसरी ओर मुस्लिम समाज की महिलाएं भी स्वयं इस व्यवस्था के विरुद्ध मुखरित हो चुकी हैं। कमोबेेश मुस्लिम समाज की आधी से अधिक महिलाएं खासतौर पर शहरी महिलाएं पर्दा परंपरा का त्याग कर चुकी हैं। मुस्लिम समाज के अंदर ही इस व्यवस्था को लेकर बड़े पैमाने पर मंथन तथा बहस जारी है। ज़ाहिर है यदि किसी दूसरे धर्म या समुदाय के लोग इस व्यवस्था पर उंगली उठाने की कोशिश करेंगे तो यहां भी जि़द अथवा संदेह कि स्थिति पैदा हो सकती है। इस प्रकार की और भी अनेक बातें हैं जो विभिन्न धर्मों में क्षेत्र तथा समुदाय के आधार पर भिन्नता के रूप में पाई जाती हैं। तीन तलाक का मसला भी एक ऐसा ही दुर्भाग्यपूर्ण विषय है जिससे स्वयं मुसलमानों का ही एक बड़ा वर्ग असहमत तथा दु:खी है।

तीन तलाक के विषय में मुस्लिम समाज का केवल एक बड़ा वर्ग ही इसके िखलाफ नहीं है बल्कि मुस्लिम उलेमाओं में भी इस विषय को लेकर भारी मतभेद है। देश के बहुत कम उलेमा ऐसे हैं जो इस व्यवस्था के पक्षधर हैं अन्यथा अधिकांश उलेमा स्वयं समय-समय पर इस व्यवस्था को गैर इस्लामी,गैर शरयी तथा गैर इंसानी बताते रहते हैं। गोया यह विषय मुस्लिम समाज के आंतरिक वाद-विवाद का विषय बन चुका है। ऐसे में क्या यह ज़रूरी है कि कोई भी राजनैतिक दल मुस्लिम महिलाओं का पक्षधर बनकर अपने घडिय़ाली आंसू बहाता फिरे? और वह भी ऐसा राजनैतिक दल जिसने कभी भी मुस्लिम हितों की चिंता की बात न सोची हो? जिसने मुस्लिम समस्याओं को उजागर करने वाली सच्चर आयोग की रिपोर्ट की पूरी तरह अनदेखी की हो? ज़ाहिर है जब ऐसे लोग मुस्लिम महिलाओं के शुभचिंतक के रूप में खड़े दिखाई देंगे तो दूसरी ओर से उनकी इस ‘घडिय़ाली’ हमदर्दी पर संदेह किया जाना स्वाभाविक है। यही वजह है कि कुछ मुस्लिम संगठन इस विषय के पक्ष में सिर्फ इसलिए खड़े हो गए हैं कि उन्हें यह संदेह होने लगा कि यह उनके धार्मिक मामलों में दखलअंदाज़ी करने की कोशिश है। इसीलिए प्राप्त समाचारों के अनुसार इन मुस्लिम संगठनों ने मुस्लिम महिलाओं में तीन तलाक की व्यवस्था के समर्थन में हस्ताक्षर अभियान भी चलाया है।

लिहाज़ा ज़रूरत इस बात की है कि कोई भी राजनैतिक दल अथवा सरकारें किसी धर्म अथवा समुदाय विशेष में पाई जाने वाली कुरीतियों व अप्रासंगिक परंपराओं को समाप्त करने या उन्हें सुधारने का जि़म्मा स्वयं लेने के बजाए उन्हीं उसी धर्म व समुदाय विशेष के धर्मगुरुओं या समाज सुधारकों पर ही छोड़ दें। और यदि सामाजिक हितों की बात करनी ही है तो सभी समाज सुधारकों व धर्मगुरुओं को दूसरे धर्म व समाज पर नुक्ताचीनी करने या उंगली उठाने के बजाए अपने ही समाज की कुरीतियों व गलत परंपराओं को उजागर करना चाहिए तथा उनमें सुधार लाने की कोशिश करनी चाहिए। हां यदि महिलाओं के प्रति हमदर्दी जतानी ही है तो उनके धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करने के बजाए उनकी शैक्षिक,आर्थिक तथा उनके स्वास्थय से संबंधित विषयों पर उनके सहयोग व आत्मनिर्भरता की बात की जानी चाहिए। उन्हें आत्मनिर्भर बनाने हेतु उन्हें रोज़गार तथा दूसरे प्रोत्साहन दिए जाने चाहिए। केवल तीन तलाक जैसे धर्म संबंधी विवादित मसले पर उनके साथ खड़े दिखाई देना उनकी हमदर्दी कम राजनीति अधिक दिखाई देती है। अत: धार्मिक विषयों के राजनीतिकरण से बाज़ आने की ज़रूरत है।