राष्ट्रवादिता का ढोंग और स्वयंभू मुंसिफ

 निर्मल रानी
निर्मल रानी

जम्मू-कश्मीर के उड़ी सेक्टर में गत् 18 सितंबर को भारतीय सेना के एक कैंप पर हुए आतंकी हमले के बाद पूरा देश भारी गुस्से में है। भारत सरकार ने पाकिस्तान द्वारा भारत में लगातार प्रायोजित किए जा रहे आतंकवाद के प्रति गंभीर रुख अिख्तयार किया हुआ है। भारत के प्रबल विरोध की गूंज दिल्ली से लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ तक में सुनाई दे रही है। ज़ाहिर है जिस आतंकी हमले ने एक ही बार में सेना के 19 जवान शहीद कर दिए गए हों ऐसे आतंकी हमले के बाद भारतीय सेना का गुस्से में होना भी स्वाभाविक है। परंतु पूरे विश्व की सेनाएं अपने-अपने राष्ट्रध्यक्षों अथवा केंद्रीय सरकार का आदेश व निर्देश मानने के लिए बाध्य रहती हैं। इसी मजबूरी के तहत भारतीय सेना भी सरकार के निर्देषों की तथा उसकी नीतियों की प्रतीक्षा में है। भारत सरकार ने िफलहाल पाकिस्तान पर दबाव डालने के और कई कूटनीतिक रास्ते अपनाएं हैं। और कई उपायों पर विचार भी किया जा रहा है। ज़ाहिर है देश की जनता इस विषय पर कितना ही प्रदर्शन अथवा अपने गम और गुस्से का इज़हार क्यों न करती रहे परंतु हमारे देश की अनुशासित सेना अपने जवानों की बड़ी से बड़ी कुर्बानी के बावजूद दिल्ली दरबार के निर्देशों की प्रतीक्षा ही करती रहती है।

परंतु हमारे देश का राजनैतिक दल शिवसेना तथा इसी संगठन से सत्ता की दावेदारी जैसे स्वार्थपूर्ण विषय को लेकर अलग हुआ एक वर्ग जिसे महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना या मनसे के नाम से जाना जाता है इस संगठन के कुछ नेता राष्ट्रहित अथवा राष्ट्रीय नीतियों की परवाह किए बिना केवल अपने सीमित क्षेत्र के सीमित लोगों को खुश करने के लिए कभी-कभी जल्दबाज़ी में कुछ ऐसे कदम उठा बैठते हैं अथवा ऐसे बयान जारी कर देेते हैं जिससे अमन-शांति अथवा सद्भाव कायम होने के बजाए विवाद तथा दुर्भावना पैदा होने लगती है। सबसे पहले 1991 में शिवसेना ने वानखेड़े स्टेडियम मुंबई में तैयार की गई क्रिकेट पिच को पाकिस्तान के प्रति अपना विरोध दर्ज कराने के लिए खोद डाला था।  सेना प्रमुख का कहना था कि पाकिस्तानी टीम के साथ न केवल मुंबई में बल्कि पूरे भारत में भारत-पाक क्रिकेट श्रंृखला नहीं होनी चाहिए। इसके बाद 1998 में शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के कहने पर ही शिवसेना के तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी ने जनवरी 1999 में मुंबई में प्रस्तावित भारत-पाक क्रिकेट मैच को रद्द कर दिया। इसी प्रकार 1999 में दिल्ली के िफरोजशाह कोटला स्टेडियम की पिच शिवसैनिकों द्वारा खोदी गई। 1999 में शिव सैनिकों द्वारा मुंबई के चर्चगेट पर स्थित बीसीसीआई के कार्यालय पर धावा बोलकर 1999 में भारत द्वारा जीती गई विश्वकप ट्राफी को क्षतिग्रस्त किया। दिसंबर 2003 में आगरा स्टेडियम में भारत-पाक क्रिकेट मैच के विरुद्ध उत्पात मचाया गया। इसी प्रकार 2010 में शाहरुख खान के विरुद्ध असंसदीय बयानबाजि़यां की गई तथा विरोध प्रदर्शन किए गए। इसके अलावा भी शिवसैनिकों व इसी विचारधारा मनसे ने कई बार अपने राजनैतिक स्वार्थ साधने हेतु ऐसे कारनामे किए जो न तो भारत सरकार की नीतियों की नुमाईंदगी करते थे और न ही सरकार की ओर से इन लोगों को कभी इस बात के लिए अधिकृत किया गया कि वे अपनी व अपने संगठन की लोकप्रियता बढ़ाने हेतु कभी क्रिकेट पिच खोदते चलें तो कभी अपनी सुविधा व असुविधा के मद्देनज़र सिने कलाकारों का विरोध करते फिरें।

पिछले दिनों एक बार फिर जम्मू-कश्मीर के उड़ी सेक्टर में भारतीय सेना पर हुए आतंकी हमले की आड़ लेकर मनसे ने यह चेतावनी जारी की है कि भारत में ‘ए दिल है मुश्किलÓ और ‘रईसÓ नामक उन िफल्मों को रिलीज़ नहीं होने देंगे जिनमें फवाद खान तथा माहिरा खान नामक पाकिस्तानी कलाकारों ने अभिनय किया है। इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने यह चेतावनी भी दी थी कि पाक कलाकार 48 घंटे के भीतर भारत छोडक़र पाकिस्तान वापस चले जाएं। मनसे की ओर से यह भी कहा गया है कि वे उस पाकिस्तान के कलाकारों को भारत में काम करने की इजाज़त कैसे दे सकते हैं जो पाकिस्तान भारतीय सैनिकों की हत्याएं करवा रहा हो। निश्चित रूप से पहली नज़र में देखने पर मनसे का बयान बड़ा ही भावुक ,राष्ट्रवादिता से परिपूर्ण तथा देशभक्ति से सराबोर प्रतीत होता है। परंतु मनसे का यह बयान वास्तव में केवल लोकलुभावना बयान है और इसमें लेशमात्र भी सच्चाई की कोई गुंजाईश नहीं है। इसका प्रमाण यह है कि उड़ी के शहीदों पर जिस मनसे द्वारा घडिय़ाली आंसू बहाए जा रहे हैं उनमें अधिकांश सैनिक उत्तर भारतीय राज्यों से संबंधित थे। अधिकांश जवान यूपी,बिहार,राजस्थान व झारखंड राज्यों के सैनिक थे।

क्या मनसे के नेता इस बात का जवाब दे सकते हैं कि जब वे मुंबई में तथा महाराष्ट्र के दूसरे कई शहरों में उत्तर भारतीयों को चुन-चुन कर पीट रहे थे, उनके रोज़गार छीन रहे थे, चलती रेलगाडिय़ों में  उन्हें पीटा जा रहा था, रेलवे स्टेशन व टैक्सी तथा ऑटो में ढूंढ-ढूंढ कर इन्हीं राज्यों के लोगों पर आक्रमण किया जा रहा था। उन्हें महाराष्ट्र में प्रवेश न दिए जाने की साजि़श रची जा रही थी क्या उस समय इन स्वयंभू राष्ट्रवादियों ने कभी यह सोचा था कि इन उत्तर भारतीयों का कोई सगा-संबंधी भारत-पाक सीमा पर दुश्मनों से लोहा लेने के लिए तैनात है तथा इन्हीं के रिश्तेदार व संबंधी आए दिन पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद के शिकार भी होते रहते हैं? इतना ही नहीं बल्कि जिस समय मुंबई पर 26/11का हमला हुआ उस समय भी यह सफेदपोश नकली शेर अपने-अपने ड्राईंग रूम में अपने पालतू कुत्तों के साथ बैठकर टेलीविज़न पर 26/11 के आप्रेशन का नज़ारा देख रहे थे। उस समय न तो शिवसेना  न ही मनसे ने अपने सैनिकों का आह्वान किया कि वे घर से निकलें और ताज होटल को घेरकर आतंकियों को जि़ंदा पकड़ कर गेट वे ऑफ इंडिया पर फांसी पर लटका दें। उस समय भी भारत सरकार ने जो विशेष कमांडो ताज होटल के आप्रेशन में भेजे उनमें ज़्यादातर लोग उत्तरप्रदेश व बिहार से संबंधित थे।

परंतु इन सब वास्तविकताओं को नज़रअंदाज़ कर यह कागज़ी शेर कभी िफल्मी कलाकारों के विरुद्ध अपना परचम बुलंद कर देते हैं तो कभी उत्तर भारतीयों के िखलाफ हो जाते हैं। जबकि वास्तव में इनके ऐसे सभी कदम, नियम,कायदे व कानूनों के िखलाफ तथा सरकार की नीतियों के विरुद्ध होते हें। खबरों के अनुसार मनसे नेताओं की ओर से यह कहा गया है कि पाक कलाकारों को उड़ी हमले की निंदा करनी चाहिए। निश्चित रूप से करनी चाहिए। पाक कलाकारों को ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के सभी शांतिप्रिय समाज के सभी लोगों को पाकिस्तान की निंदा करनी चाहिए तथा आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए उसे ज़लील भी करना चाहिए। परंतु पाकिस्तान का िफल्म उद्योग,वहां के बुद्धिजीवी,साहित्यकार,कलाकार तथा पाकिस्तान के सभी लेखक आईएसआई की नीतियों का समर्थन करते हों ऐसा भी नहीं है। पाकिस्तान में ही 2007 में खुदा के लिए नाम की एक िफल्म रिलीज़ हुई थी जो अप्रैल 2008 में भारत में भी दिखाई गई। पाकिस्तान के िफल्म निर्देशक शोएब मंसूर ने इस िफल्म का कथालेखन व निर्देशन किया था। इस िफल्म में जहां फवाद अफज़ल खान,ईमान अली,शान,नईम ताहिर जैसे कई पाकिस्तानी कलाकारों ने काम किया था वहीं भारतीय िफल्म अभिनेता नसीरूद्दीन शाह ने भी इस िफल्म में अपनी ज़बरदस्त भूमिका निभाई थी। अमेरिका में हुए 11 सितंबर 2001 के हमले के बाद बनी इस िफल्म में कट्टरवादी विचारधारा,आतंकवाद तथा जेहाद शब्द का दुरुपयोग किए जाने को बहुत ही सुंदर तरीके से िफल्माया गया था। गोया ऐसा भी नहीं है कि पाक कलाकार अथवा  वहां का पूरा सिने उद्योग पाकिस्तान की आतंकी व जेहादी नीतियों का समर्थन करता हो।

यही वजह है कि मनसे द्वारा पाकिस्तानी कलाकारों को दी गई धमकी के बाद कांग्रेस पार्टी ने उन मनसे नेताओं के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की मांग की है जो इस प्रकार का गैर कानूनी बयान देकर झूठी लोकप्रियता हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। बावजूद इसके कि मनसे की धमकी से डरकर कुछ पाकिस्तानी कलाकार वापस भी चले गए हैं। परंतु मुंबई पुलिस ने पाक कलाकारों को सुरक्षा दिए जाने का पूरा आश्वासन भी दिया है। करण जौहर,जूही चावला सहित कई भारतीय सिने कलाकारों ने भी मनसे के नेताओं द्वारा पाक कलाकारों को दी गई धमकी की आलोचना की है। और कड़े शब्दों में उनके बयानों की निंदा भी की है। कहना गलत नहीं होगा कि महाराष्ट्र और खासतौर पर मुंबई तक की राजनीति में सिमटे यह कूप मंडूक नेता महज़ अपनी क्षेत्रीय लोकप्रियता हासिल करने के लिए जब और जैसे चाहते हैं राष्ट्रवादिता का ढोंग रचने लगते हैं और जब चाहे तब यही लोग स्वयंभू मुंसिफ भी बन बैठते हैं।