दक्षेस सम्मेलन का रद होना भारत की कूटनीतिक कामयाबी

तो इस्लामाबाद में नौ नवंबर से होने वाले दो दिवसीय दक्षेस शिखर सम्मेलन को भले टलना कहा जाए यह व्यवहार में रद्द होना है। जो हालात हैं उनमें पाकिस्तान में सम्मेलन होने की संभावना नहीं है। भारत की ओर से जैसे ही यह घोषणा की गई कि न प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वहां जाएंगे और न भारत का कोई अधिकारी वैसे ही इसका रद्द होना सुनिश्चित हो गया। दक्षेस के चार्टर के अनुसार यदि आठ में से एक भी सदस्य देश भाग नहीं लेता तो सम्मेलन नहीं हो सकता। यहां तो भारत के साथ अफगानिस्तान, बांग्लादेश और भूटान ने भी सुर मिला दिया। वास्तव में यह भारत की पाकिस्तान विरोधी नीति की बहुत बड़ी सफलता है जिसके परिणाम आगे और कई रुपों में सामने आएंगे। भारत ने ऐसा फैसला नहीं किया होता तो दक्षेस के ये तीन देश भी ऐसा नहीं करते। तो कुछ हुआ वह भारत के शिरकत न करने के कारण हुआ। भारत के इस फैसले का पाकिस्तान स्वागत नहीं कर सकता। इसलिए उसकी प्रतिकूल प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। किंतु पाकिस्तान न भूले कि उसकी तमाम दुर्नीतियों के बावजूद गृृहमंत्री राजनाथ सिंह दक्षेस गृहमंत्रियों के सम्मेलन में भाग लेने 4 अगस्त को इस्लामाबाद गए थे। उनके साथ क्या व्यवहार हुआ यह पूरी दुनिया को पता है। उसके पूर्व दक्षेस की तैयारी के लिए अधिकारियों की बैठक में भी भारत का प्रतिनिधित्व हुआ था। इसका अर्थ यह हुआ कि भारत ने अपनी ओर से दक्षेस सम्मेलन को बचाने का हर संभव धैर्य और संयम दिखाया। किंतु ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती। अगर कोई देश किसी सूरत में अपने-आप सुधरने को तैयार नहीं, वह जानबूझकर हमें घाव देता रहे और फिर भी कहे कि आप हमारे साथ शांतिपूर्ण व्यवहार करें, हमारे यहां सम्मेलन में शिरकत करें तो इसे कैसे स्वीकार किया जा सकता है। भारत का फैसला पाकिस्तान के रवैये को देखते हुए बिल्कुल सही है। बल्कि सरकार यदि इसके विपरीत फैसला लेती यानी मौजूदा हालात में वहां जाने का निर्णय किया जाता तो गलत होता।

पाकिस्तान न भूले कि आतंकवाद को लेकर उसके आचरण से समस्या अकेले भारत को नहीं है। बंाग्लादेश और अफगानिस्तान को भी आतंकवाद पर उसके रवैये से समस्या है। दोनों देशों ने अपने यहां आतंकवाद के लिए उसी तरह दोषी माना है जैसे भारत मानता है। अफगानिस्तान के उपराष्ट्रपाति सरवर दानिश ने तो संयुक्त राष्ट्र के आम सभा में पाकिस्तान पर आरोप लगाया कि वह अपने यहां आतंकवादियों को संरक्षण, संसाधन और प्रशिक्षण देकर हमारे यहां भेजता है। हमारी बातों का उस पर कोई असर नहीं। बांग्लादेश ने अपने यहां आतंकवादी हमलों के लिए सीधे पाकिस्तान को दोषी माना है। ये सारे देश जानबूझकर क्यों एक निर्दोष देश को दोषी ठहराएंगे? भारत की भूमिका दक्षेस को बचाने में किसी देश से ज्यादा रही है। इसलिए वह जानबूझकर केवल अपने झनक के लिए दक्षेस सम्मेलन की बलि नहीं चढ़ा सकता। किंतु पाकिस्तान ने आतंकवाद का निर्यात करके जो हालात पैदा कर दिए हैं उसमें दक्षिण एशिया के देश किस सहयोग पर चर्चा करेंगे? किस आपसी एकता पर बात करेंगे या संकल्प लेंगे? वैसे भी दक्षेस के पूर्ण रुप से पल्लवित-पुष्पित होने में सबसे बड़ी बाधा पाकिस्तान ही रहा है। उसके रवैये से ही दक्षिण एशिया पूरी तरह मुक्त व्यापार क्षेत्र न बन सका है। भारत ने तो उसे 20 वर्ष पहले ही विशेष तरजीही राष्ट्र का दर्जा दे दिया लेकिन उसने आज तक ऐसा नहीं किया। उसने सड़क मार्ग से दक्षेस देशों में मुक्त आवागमन की योजना का भी विरोध किया और अंततः भारत ने उसके बिना बांग्लादेश एवं नेपाल के साथ मोटर यातायात समझौता किया।

तो पाकिस्तान को भारत पर अपनी खीझ निकालने की बजाय स्वयं के बारे मंें आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। विदेश मंत्रालय ने इस्लामाबाद सम्मेलन में भारत के शामिल नहीं होने के फैसले की जानकारी देते हुए दक्षेस के मौजूदा अध्यक्ष  नेपाल को जो कारण दिया है उसमें कुछ भी गलत नहीं है। उसमें कहा गया है कि सीमा पार से लगातार आतंकवादी हमले हो रहे हैं और एक सदस्य देश दक्षेस सदस्य देशों के आंतरिक मामलों में लगातार दखल दे रहा है।  इसके अनुसार यह काम इस क्षेत्र के एक देश की ओर से हो रहा है। इस देश ने ऐसा माहौल बना दिया है कि सम्मेलन सफल नहीं हो सकता है। भारत क्षेत्रीय सहयोग तथा एक दूसरे से जुड़े रहने के अपने वादे पर हमेशा भरोसा रखता है, लेकिन इन मामलों में तभी आगे बढ़ सकते हैं, जब आतंक से मुक्त माहौल हो। इसमें क्या गलत है? यही बात बांग्लादेश और अफगानिस्तान ने भी नेपाल को लिखा है। भूटान ने भी लिखा है कि वह दूसरे सदस्य देशों की इन बातों से सहमत है और इसमें दक्षेस सम्मेलन में भाग लेने में असमर्थ है। वस्तुतः पूरे क्षेत्र में एक ही देश है पाकिस्तान जो आतंकवाद का केन्द्र है। वह आतंकवादियों को तैयार कर पड़ोसी देशों में भेजता है और हमले करवाता है। एक ही देश है जो दूसरे के मामले में हस्तक्षेप करता है चाहे वह भारत हो या अफगानिस्तान। इसमें इस्लामाबाद मंे सम्मेलन के सफल होने की संभावना ही पैदा नहीं होती है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने ठीक ही ट्वीट किया कि क्षेत्रीय सहयोग और आतंकवाद एक साथ नहीं चल सकते।

वास्तव में जब पानी सिर से गुजर जाए तो फिर आपके पास उससे निकलने के लिए हर तरह से हाथ पांव मारने का विकल्प ही रह जाता है। पाकिस्तान ने संबंधों को तार-तार करने की सारी सीमाएं लांघ दी हैं। इसमें एकमात्र कोई रास्ता बचता है तो वह है उसे अलग-थलग करने का। भारत इस समय इसी नीति पर चल रहा है। यह विडम्बना होती अगर अलग-थलग करने की अपनी नीति की घोषणा करने के बाद भारत इस्लामाबाद दक्षेस सम्मेलन में शिरकत करता। पहले भी ऐसी गलतियां हो चुकीं हैं। जो लोग कह रहे हैं कि पाकिस्तान की गलतियों का खामियाजा दक्षेस को न भुगतने दिया जाए वो इसके व्यापक फलक को नहीं देख रहे हैं। ऐसे मामलों में भावुकता से काम नहीं चलता। पाकिस्तान को जब तक बड़ी सजा नहीं मिलेगी, उसे घुटन अनुभव नहीं होगा उसमें सुधार असंभव है। दक्षेस का भविष्य भी बेहतर तभी हो सकता है जब पाकिस्तान जैसा देश या तो सुधर जाए या फिर वह इस संगठन से बाहर हो जाए या कर दिया जाए। हर स्तर से पाकिस्तान को अलग-थलग करने, उसकी घेरेबंदी की जरुरत है और दक्षेस उसका एक माध्यम है। इस समय भारत न दक्षेस को माध्यम बनाकर दक्षिण एशिया में उसे अलग-थलग करने में आधी सफलता पा ली है। वैसे ऐसा भी नहीं है कि दक्षेस में भारत ने पहली बार न जाने का निर्णय लिया है। इसके पूर्व फरबरी 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने भी ढाका शिखर सम्मेलन में शामिल होने से इन्कार कर दिया था। इसी कारण सम्मेलन स्थगित हुआ था। उस समय बांग्लादेश की बिगड़ी कानून व्यवस्था के आधार पर कहा गया था कि वहां प्रधानमंत्री की सुरक्षा को खतरा है। तब बेगम खालिदा जिया की सरकार पूरी तरह भारत विरोधी नीति पर चल रहीं थीं एवं भारत विरोधी तत्वों को वो पाकिस्तान के उकसावे पर प्रोत्साहित भी करतीं थीं। भारत ने एक निर्णय लिया और उसका अच्छा असर हुआ।

पाकिस्तान जैसे देश के साथ सम्मेलन में शिरकत करने की जगह उसके खिलाफ प्रतिबंधों की नीतियां अपनाने की आवश्यकता है। भारत विशेष तरजीही राष्ट्र का दर्जा हटा ले तो इससे बहुत ज्यादा असर भले न हो, क्योंकि दोनों देशों के बीच व्यापार केवल 2.67 अरब डॉलर का है पर यह उसे अलग-थलग करने की दिशा का एक महत्वपूर्ण कदम अवश्य होगा। कुछ लोग इसे लेकर भी छाती पीटंेगे लेकिन उनके पास इसका क्या जवाब है कि पाकिस्तान ने आज तक हमें क्यों नहीं तरजीही देश का दर्जा दिया? भारत को वह तरजीह देता है आतंकवादी हमला कराने में, कश्मीर में अलगाववाद और हिंसा की आग भड़काने में तथा कश्मीर मामले को लेकर दुनिया भर में भारत को लांछित करने की असफल कोशिशों में। तो इसका जवाब यही है हम भी उसे उसी तरह तरजीह दे रहे हैं। दक्षेस सम्मेलन रद्द करा दिया हमने। रद्द हो जाने के बाद वह इसका अध्यक्ष नहीं बन सकता। पाकिस्तान दक्षेस का सदस्य है तो इसके सफल बनाने की जिम्मेवारी उसकी भी है। वास्तव में इसके आठों सदस्य देश भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, मालदीव और भूटान सबकी बराबर की जिम्मेवारी है। पाकिस्तान को अलग कर दीजिए तो थोड़े-बहुत स्वाभाविक मतभेदों के बावजूद इस समय बाकी देशों के बीच हर स्तर का सहयोग है और रहेगा। दक्षेस में आतंकवाद का खात्मा भी शामिल है। क्या पाकिस्तान के रहते यह संभव है? दक्षेस का लक्ष्य क्षेत्रीय विकास है और इसके लिए शांति और हिंसारहित वातावरण जरुरी है। तो भारत का यह कदम दूरगामी दृष्टि से दक्षेस के लक्ष्यों को पूरा करने वाला साबित हो सकता है।

-अवधेश कुमार