आदिशक्ति की आराधना का पर्व शारदीय नवरात्रि

नरेश सोनी ‘स्वतंत्र पत्रकार’
नरेश सोनी  ‘स्वतंत्र पत्रकार’

आश्विन शुक्ल की प्रतिपदा (एकम) से नवमी तिथि तक शारदीय नवरात्रि महापर्व देवी की आराधना का पर्व है, नवरात्रि में देवी की आराधना से व्यक्ति के जीवन में ऊर्जा का संचार होता है तथा उसके सभी मनोरथ पूरे होते हैं। भारतीय संस्कृति में वासन्तिक (चैत्रीय) तथा शारदीय नवरात्रि (क्वांर) का बहुत महत्व है, नवरात्रि पर्व का जो सबसे ज्यादा महत्व है वह यह है कि परिवार तथा कुल के सभी सदस्य अपनी रीति अनुसार एकजुट होकर अष्टमी, नवमी आदि की पूजा करते हैं। नवरात्रि में परिवार सहित पूजा करने के लिए अनेक लोग दूर-दूर से अवकाश लेकर अपने पुश्तैनी घर पर आते हैं, देवी की यह आराधना का पर्व हमारी भारतीय संस्कृति में संयुक्त परिवार पोषक व्यवस्था का संदेश है, जिसमें परिजन साल भर झगड़ते रहते हो किन्तु प्रत्येक छ: माह में देवी पूजा के लिये अपने परिवार के बीच पहुंच जाते हैं।

मार्कण्डेय पुराण में शक्ति स्वरुपा देवी का विस्तार से विवरण दिया गया है। दुर्गापाठ, तथा दुर्गासप्तश्लोकी के सही तथा शुद्ध रूप से पाठ करने पर देवी प्रसन्न हो जाती है।
शास्त्रों में कहा गया है कि देवी की स्थापना विधि-विधान पूजन अर्चन के साथ की जाती है। देवी की आराधना मुख्यत: देवी के उन मंदिरों पर की जाती है जहां देवी की प्राण-‍प्रतिष्ठित मूर्ति हो। नवरात्रि में चाहे जहां अशुद्ध स्थानों, मार्गों, सड़कों आदि पर देवी की स्थापना करना वर्जित है। शोर-शराबे द्वारा भी देवी की आराधना नहीं की जाती है। शांत चित्त होकर एकाग्र भाव से की आराधना व्यक्ति समाज तथा राष्ट्र का कल्याण कर सकती है। अन्यथा प्रतिकूल परिणाम भी देती है।

नवरात्रि में आरंभ में पवित्र स्थान की मिट्टी से वेदी बनाकर उसमें जौं गेहूं बोये। फिर अपनी शक्ति के अनुसार बनवाये गये सोने, तांबं आदि अथवा मिट्टी के कलश को विधि पूर्वक स्थापित करें। कलश के ऊपर सोना, चांदी, तांबा, पाषाण अथवा चित्रमयी मूर्ति की प्रतिष्ठा करें। मूर्ति यदि कच्ची मिट्टी कागज या सिन्दूर आदि से बनी हो तो उसके ऊपर शीशा लगा दें। मूर्ति न हो तो कलश के पीछे स्वास्तिक और उसके दोनों ओर त्रिशूल बनाकर दुर्गाजी का चित्र विराजित कर पूजन करें। पूजन स्वास्तिक हो, राजस और तामस नहीं। नवरात्रा के आरम्भ में स्वस्ति वाचन-शान्ति पाठ करके संकल्प करें और तब सर्वप्रथम गणपति की पूजा कर मातृका, लोकपाल, नवग्रह एवं वरुण का सविधि पूजन करें। फिर प्रधान मूर्तिका षोड्शोपचार पूजन करना चाहिए। पूजन वेद-विधि या सम्प्रदाय-निर्दिष्ट विधि से होना चाहिये। दुर्गादेवी की आराधना अनुष्ठान में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का पूजन तथा मार्कण्डेय पुराणान्तर्गत निहित ‘श्री दुर्गासप्तशती’ का पाठ मुख्य रूप से करना चाहिए।

‘श्री दुर्गा सप्तशती’ पुस्तक का
नमो देवयै महादेव्यै शिवायै सततं नम:।
नम: प्रकृत्यै भद्रायै नियता: प्रणता:स्म ताम् ।।
इस मंत्र से पञ्चोपचार पूजन कर यथाविधि पाठ करें।

देवी व्रत में कुमारी-पूजन परम आवश्यक माना गया है। सामर्थ्य हो तो नवरात्रभर प्रतिदिन, अन्यथा समाप्ति के दिन नौ कुमारियों के चरण धोकर उन्हें देवी रुप मानकर गन्ध-पुष्पादि से अर्चन कर आदर के साथ यथारुचि मिष्ठान्न भोजन कराना चाहिये एवं वस्त्रादि से सत्कृत करना चाहिये।

शास्त्रों में आया है कि एक कन्या की पूजा से ऐश्वर्य की दो, की पूजा से भोग और मोक्ष की, तीन की अर्चना से धर्म, अर्थ, काम-त्रिवर्ग की चार की, अर्चना से राज्य पद की, पांच की पूजा से विद्या की, छ: की पूजा से षट्कर्म सिद्धि की, सात की पूजा से राज्य की, आठ की अर्चा से सम्पदा की और नौ कुमारी कन्याओं की पूजा से पृथ्वी के प्रभुत्व की प्राप्ति होती है। कुमारी-पूजन में दस वर्ष तक की आयु वाली कन्या का अर्चन विहित है। दस वर्ष से ऊपर की आयु वाली कन्या का कुमारी-पूजन में वर्जन किया गया है। दो वर्ष की कन्या कुमारी, तीन वर्ष की त्रिमूर्तिनी, चार वर्ष की कल्याणी, पांच वर्ष की रोहिणी, छ: वर्ष की काली, सात वर्ष की चन्द्रिका, आठ वर्ष की शाम्भवी, नौ वर्ष की दुर्गा और दस वर्ष वाली सुभद्रा स्वरुपा होती है।

दुर्गा-पूजा में प्रतिदिन का वैशिष्टय रहना चाहिये। प्रतिपदा को केश संस्कारक द्रव्य-आंवला सुगन्धित तेल आदि केश प्रसाधन, द्वितीया को बाल बांधने-गूंथने वाले रेशमी सूत, फीते आदि तृतीया को सिन्दूर और दर्पण आदि चतुर्थी को मधुपर्क , तिलक और नेत्राञ्जन पंचमी को अंगराग चन्दनादि एवं आभूषण, षष्ठी को पुष्प तथा पुष्पमालादि समर्पित करें। सप्तमी को ग्रहमध्यपूजा, अष्टमी को उपवासपूर्वक पूजन, नवमी को महापूजा और कुमारी पूजा करें। दशमी को पूजन के अनन्तर पाठकर्ता की पूजा कर दक्षिणा दे एवं आरती के बाद विसर्जन करें। श्रवण-नक्षत्र में विसर्जनाङ्ग पूजन प्रशस्त कहा गया है। दशमाश हवन, तर्पण, मार्जन और ब्राह्मण-भोजन कराकर व्रत समापन किया जाता है।