खाट कांग्रेस की लुटी, बदनाम गरीब हो गया

– अजय कुमार
खाट कोई लूट रहा है और तोहमत किसी और पर लगाई जा रही है। खाट लूट कांड में कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी गरीबों को बदनाम कर रहे हैं, जबकि वह जानते हैं कि खाट पर बैठने और उसे लूटने वाले दोनों ही कांग्रेसी थे, जिन्हें राहुल की खाट पंचायत के लिये विशेष तौर पर आमंत्रित किया गया था। इसीलिये राहुल गरीबों की आड़ में कांग्रेसियों के कृत्यों पर पर्दा डाल रहे हैं। गरीब में अगर लूटपाट करने की हिम्मत होती तो वह ताउम्र गरीबी का दर्द क्यों सहता रहता, जो गरीब आजादी के 70 वर्षों के बाद भी अपना वाजिब हक नहीं हासिल कर सका, वह खाट लूट की हिम्मत कैसे कर सकता है? अच्छा होता राहुल गांधी और उनके टीम के सदस्य फरार उद्योगपति विजय माल्या के बहाने कार्यकर्ताओं की लूटपाट पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं करते क्योंकि सब जानते हैं कि उद्योगपति विजय माल्या जो हजारों करोड़ का बैंकों का कर्ज लेकर भागा है, वह कर्ज कांग्रेस शासनकाल में कांग्रेसियों की मेहरबानी से ही उसे हासिल हुआ था।
कहीं खाट लूटी जा रही है और कहीं टूट रही है, लेकिन राहुल की सियासत पर इससे कोई असर पड़ता नहीं दिख रहा है। वह तो पिछले तमाम चुनावों की ही तरह इस बार भी गुरिल्ला शैली में आरोप−प्रत्यारोप की सियासत को ही आगे बढ़ा रहे हैं। खैर, खाट भले ही आज चर्चा में हो लेकिन राहुल गांधी का खाट (खटिया, चारपाई, खटोला) प्रेम काफी पुराना है। वह खाट पंचायत की तर्ज पर पहले भी खाट चौपाल लगा चुके हैं। खाट पर बैठकर दलितों के यहां भोजन का स्वाद लेते अखबारों में प्रकाशित राहुल की तस्वीरें आज भी लोगों के जहन में ताजा हैं। चुनावी मौसम में कई बार उनका गांवों में रात्रि विश्राम भी हो चुका है। तब भी उनकी नींद खाट पर ही पूरी होती थी। कोई भी चुनाव आता है तो उससे पांच−छह महीने पूर्व राहुल का जनता को लुभाने के लिये इस तरह का उपक्रम शुरू हो जाता है। चाहें 2009 के लोकसभा चुनाव हों या फिर 2012 के विधानसभा से पहले का समय अथवा 2014 के लोकसभा चुनाव से पूर्व की बात, चुनावी मौसम में अक्सर गांव, किसान, दलित, मजदूरों का दुख−दर्द राहुल को बेचैन कर देता है, मगर चुनाव जाते ही उनकी बातें और वायदे ठंडे बस्ते में चले जाते हैं।

बात खाट पंचायत की ही कि जाये तो देवरिया से दिल्ली तक की यात्रा के दौरान राहुल गांधी का करीब ढाई सौ विधान सभा क्षेत्रों में खाट पंचायत का कार्यक्रम खाट लूट और टूट कांड के चलते अपने मकसद से भटक गया। यूपी फतह को राज्य के भ्रमण पर निकले राहुल गांधी के अतीत पर नजर डाली जाये तो इसमें कहीं कोई संदेह नजर नहीं आता है कि यूपी की जनता ने राहुल और उनके इस तरह के तमाम कार्यक्रमों को कभी गले नहीं लगाया। राहुल की सरपरस्ती में 2014 के लोकसभा चुनाव ने तो राहुल और कांग्रेस की ‘कमर’ ही तोड़ दी। कांग्रेस देश के सबसे बड़े राज्य में दो सीटों पर परिवार तक ही सिमट गई।

2014 के लोकसभा चुनाव में सबसे कम सीटें जीतने का श्रेय विरोधी भले ही कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को दे रहे हों, लेकिन राहुल इससे विचलित नहीं हुए हैं। वह एक बार फिर 2017 के लिये कमर कमर कसने लगे हैं। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की छिन चुकी सियासी जमीन को वापस पाने और यूपी की अखिलेश सरकार को उखाड़ फेंकने की कसरत के तहत राहुल ने अपनी सबसे लंबी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर प्रहार के साथ की तो राजनैतिक पंडितों का माथा चकरा गया कि आखिर राहुल लड़ किससे रहे हैं। यूपी में तो भाजपा सत्ता में है ही नहीं, यहां समाजवादी पार्टी की सरकार है, परंतु राहुल सपा पर नपे तुले शब्दों मे हमला कर रहे है। वह अखिलेश को अच्छा लड़का बता रहे हैं। बसपा के प्रति भी राहुल के तेवर हल्के हैं। कांग्रेस के चुनावी अभियान का औपचारिक आगाज करते हुए राहुल ने कहा कि अगर यूपी में कांग्रेस की सरकार बनती है तो किसानों का, ‘कर्ज माफ, बिजली का बिल हाफ’ हो जायेगा। अंदाज लगाया जा सकता है कि कांग्रेस यूपी चुनाव में किसानों की समस्याओं को सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने जा रही है, जिसके केन्द्र में मोदी ही रहेंगे।
बहरहाल, यूपी के पिछले दो विधानसभा और पिछले लोकसभा चुनावों में पूरी कोशिश के बाद भी राहुल कांग्रेस को चौथे नंबर की पार्टी से आगे नहीं बढ़ा सके हैं। अबकी वह अपने नये रणनीतिकारों के सहारे क्या कर पायेंगे, यह देखने वाली बात होगी। कांग्रेस की सिकुड़ती जमीन को बचाने के लिए राहुल इस बार उत्तर प्रदेश का चुनाव आर-पार की लड़ाई जैसा लड़ रहे हैं। देवरिया से दिल्ली तक की 2500 किलोमीटर की इस यात्रा में राहुल तीन हफ्ते में 39 जिलों के 55 लोकसभा क्षेत्रों और 233 विधानसभा सभा क्षेत्रों पर कांग्रेस नेताओं/कार्यकर्ताओं में जान फूंकते दिखे। शुरूआत पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के रुद्रपुर में किसानों के साथ पहले खाट सम्मेलन से हुई थी। यात्रा के दौरान राहुल भगवान राम की नगरी अयोध्या में हनुमान गढ़ी भी गये, लेकिन उन्होंने इस बात का पूरा ख्याल रखा कि किसी भी तरह से उनकी यात्रा का फोकस किसानों से हट नहीं जाये, इसीलिये वह हनुमान गढ़ी तो गये लेकिन राम लला के दर्शन नहीं किये। तमाम पंचायतों और जनसभाओं में राहुल ने किसानों के हालात का ठीकरा मोदी सरकार पर फोड़ते हुए कहा कि अकेले यूपी के किसानों पर 59 हजार करोड़ रुपए का कर्ज है। उन्होंने कहा कि केन्द्र ने 1 लाख 14 हजार करोड़ रुपए के बैंकों के एनपीए माफ कर दिए हैं जिन्हें बड़े पूंजीपतियों ने कर्ज के रूप में लिया था और नहीं चुकाया। राहुल ने कहा कि किसानों की कर्ज माफी के साथ बिजली का बिल भी वह आधा कराने की कोशिश करेंगे। मतलब, कांग्रेस 70 वर्षों के बाद भी किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिये प्लान बनाने की बजाये उन्हें कर्ज माफी के सहारे लुभाने की कोशिश कर रही है।